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Dr. Srimati Tara Singh
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भ्रष्टाचार और आज का युवा

 

भ्रष्टाचार और आज का युवा :  अनुभव, सवाल और सच्चाई 


आज का भारत एक विरोधाभासी दौर से गुजर रहा है। एक ओर तकनीक, सूचना और संचार के अभूतपूर्व साधन उपलब्ध हैं, तो दूसरी ओर व्यवस्था के भीतर गहरे तक पैठा भ्रष्टाचार लगातार लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को चुनौती दे रहा है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक चर्चा का विषय है—आज का युवा। सवाल उठता है कि क्या आज का युवा पहले से अधिक जागरूक है? क्या वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध सचमुच संघर्ष कर रहा है, या उसका विरोध केवल सोशल मीडिया तक सीमित होकर रह गया है? इन सवालों के उत्तर खोजने के लिए हमें आज के युवाओं के अनुभवों, उनके सवालों और व्यवस्था की सच्चाई—तीनों को एक साथ समझना होगा।

सोशल मीडिया के इस युग में यह निर्विवाद सत्य है कि युवाओं की जागरूकता का दायरा बढ़ा है। आज गांव, प्रखंड मुख्यालय या जिला मुख्यालय में होने वाले छोटे-से-छोटे भ्रष्टाचार की जानकारी भी मोबाइल कैमरे के माध्यम से सार्वजनिक हो जाती है। रिश्वत लेते हुए अधिकारी, योजनाओं में गड़बड़ी, गरीबों के हक पर डाका—इन सबके वीडियो बनाकर युवा सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं और अपनी बात बेझिझक रख रहे हैं। जिस मुद्दे को मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता है, उसे सोशल मीडिया पर युवा मुखरता से उठाते हैं। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है। पहले जहां शिकायतें फाइलों में दब जाती थीं, वहीं अब एक वीडियो हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाता है और व्यवस्था पर दबाव बनाता है।

लेकिन इस जागरूकता के साथ-साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं। क्या केवल वीडियो बनाना और पोस्ट करना ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष है? क्या इससे व्यवस्था में स्थायी बदलाव आ पा रहा है? अनुभव बताता है कि कई मामलों में वायरल वीडियो के बाद त्वरित कार्रवाई तो होती है, लेकिन कुछ समय बाद वही पुरानी स्थिति लौट आती है। कहीं अधिकारी निलंबित हो जाते हैं, कहीं जांच बैठा दी जाती है, पर जड़ में बैठा भ्रष्टाचार जस का तस बना रहता है। इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या हमारा विरोध सतही है या हम वास्तव में दीर्घकालिक संघर्ष के लिए तैयार हैं?

आज एक और चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जो परंपरागत और अहिंसक तरीके भ्रष्टाचार और अन्याय से लड़ने के लिए अपनाए जाते थे—जैसे शांतिपूर्ण आंदोलन, धरना, सत्याग्रह, भूख हड़ताल—उनके प्रति युवाओं में एक तरह की अरुचि या अविश्वास पैदा हो गया है। महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन या सत्याग्रह जैसे तरीकों को आज का एक बड़ा वर्ग “अप्रभावी” या “पुराने जमाने का” कहकर खारिज कर देता है। यही नहीं, कई युवा तो उन महापुरुषों की खुली आलोचना करते नजर आते हैं जिन्होंने अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष के रास्ते पर चलकर देश को आज़ादी दिलाई।

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं को आज का कुछ युवा वर्ग “नरम” या “कमजोर” बताने से नहीं चूकता। उनके अनुसार शांतिपूर्ण तरीकों से आज के दौर में कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। यह सोच अपने आप में खतरनाक है, क्योंकि यह हमें उस ऐतिहासिक अनुभव से काट देती है जिसने दिखाया कि संगठित, नैतिक और अहिंसक संघर्ष भी सत्ता को झुकाने की क्षमता रखता है। सवाल यह नहीं है कि पुराने तरीके आज वैसे ही लागू किए जा सकते हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम संघर्ष की नैतिकता और धैर्य को पूरी तरह त्यागते जा रहे हैं?

वास्तविकता यह भी है कि आज का भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक जटिल और संस्थागत हो चुका है। यह केवल व्यक्तिगत लालच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक पूरी व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है। कई बार तो भ्रष्टाचार को “लीगल” या “सिस्टम का हिस्सा” बनाने की कोशिश होती दिखाई देती है। नियम-कानून ऐसे बनाए या तोड़े-मरोड़े जाते हैं कि भ्रष्ट आचरण भी वैध प्रतीत होने लगे। यही सबसे बड़ा संकट है।

ग्रामीण भारत की योजनाओं पर नजर डालें तो यह सच्चाई और भी स्पष्ट हो जाती है। इंदिरा आवास योजना, मनरेगा या अन्य कल्याणकारी योजनाएं—जिनका उद्देश्य गरीबों को राहत देना है—वही योजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार बन जाती हैं। अनुभव यह बताता है कि इंदिरा आवास योजना का लाभ पाने के लिए लाभार्थी को पहले ही 20 से 30 हजार रुपये तक रिश्वत देनी पड़ती है। जो पैसे देता है, उसका काम तुरंत हो जाता है; जो नहीं देता, उसे महीनों तक प्रखंड कार्यालय और पंचायत के चक्कर काटने पड़ते हैं। यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि गरीबों के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है।

यह स्थिति युवाओं के सामने एक कठिन दुविधा खड़ी करती है। एक ओर वे इस अन्याय को देखकर आक्रोशित होते हैं, दूसरी ओर वही व्यवस्था उन्हें भी धीरे-धीरे समझौते के लिए मजबूर करती है। प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर नौकरी, तबादले, प्रमाण-पत्र—हर स्तर पर भ्रष्टाचार का सामना करते-करते कई युवा या तो निराश हो जाते हैं या फिर उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके खिलाफ कभी वे आवाज उठाते थे। यही वह बिंदु है जहां “आदर्शवाद” और “यथार्थवाद” के बीच टकराव शुरू होता है।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि आज का युवा पूरी तरह दिशाहीन या अवसरवादी है। सच्चाई यह है कि युवा वर्ग के भीतर एक गहरी बेचैनी है—एक ऐसा प्रश्न जो लगातार मन में उठता है कि “आखिर कब तक?” सोशल मीडिया पर उठने वाली आवाजें, आरटीआई का उपयोग, जनहित याचिकाएं, स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे आंदोलन—ये सभी संकेत हैं कि युवा पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है। समस्या यह है कि यह ऊर्जा अभी बिखरी हुई है, संगठित नहीं है।

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल गुस्सा या वायरल वीडियो पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए निरंतरता, संगठन और नैतिक स्पष्टता की आवश्यकता है। आज के युवा को यह समझना होगा कि अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष कमजोरी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक बदलाव का मजबूत आधार हो सकते हैं। साथ ही, यह भी जरूरी है कि पुराने तरीकों को आज की परिस्थितियों के अनुसार नए रूप में अपनाया जाए—जहां सोशल मीडिया, कानूनी लड़ाई और जमीनी आंदोलन एक-दूसरे के पूरक बनें, न कि विकल्प।

अंततः सच्चाई यही है कि भ्रष्टाचार केवल “उनका” नहीं, बल्कि “हमारा” भी सवाल है। जब तक युवा केवल व्यवस्था को कोसता रहेगा और खुद को उससे अलग मानता रहेगा, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। लेकिन जिस दिन युवा अपने छोटे-छोटे समझौतों पर भी सवाल उठाने लगेगा, उसी दिन वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होगी। आज का युवा जागरूक है, सवाल कर रहा है—अब जरूरत है कि वह अपनी इस जागरूकता को धैर्य, नैतिकता और संगठित संघर्ष में बदल दे। तभी “भ्रष्टाचार और आज का युवा” केवल एक विषय नहीं, बल्कि बदलाव की कहानी बन सकेगा।


धनञ्जय कुमार 

शोधार्थी 

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय 

आरा, भोजपुर, बिहार 

संपर्क सूत्र - 9297582548

Email ID - dhannuu456@gmail.com



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