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पवन जी मुख़्तसर कविताओं में विविध रंग

 

पवन जी मुख़्तसर कविताओं में विविध रंग

देवी नागरानी

1-वह पानी की तरह थी

जिसे सबने बरतन समझा

उसने सबको तरलता दी

पर कोई नहीं समझ पाया

कि उसे भी बाँधना थकाता है


वह हर रूप में ढलती रही

माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी, 

पर किसी ने कभी नहीं पूछा

तुम क्या हो?


उस दिन

जब वह भाप बन गई

तो सबने उसे

अचानक खो देने की शिकायत की


नारी के मन की विशालता भी समुद्र की तरह गहराइयों को भी अपने ह्रदय के भीतर समेट लेती है, यह भी ज़ाहिर नहीं होने देती कि उसकी अपनी हस्ती क्या है, चाहत क्या है. यहाँ तक कि रिश्तों के निबाह-निर्वाह में उसका समस्त जीवन बीतता जा रहा है, उसके खाली आँचल में सब अब अपनी अपनी इच्छाओं और  उम्मीदों से कुछ इस तरह भर देते है की वह उन्हें पूरा करने में खुद की हर चाहत की पूर्ति की हर संभावना से वंचित होती रहती है.

वह अपनी जवाबदारियों को पूरा करते करते अपनी आशाओं और इच्छाओं का दामन छोड़ देती है, तब तक जब तक उसके अपने वजूद का रोआँ रोआँ हर उम्मीद के दायरे से निकल उस एकल अवस्था में रहने का आदि नहीं हो जाता , जहाँ उसे अपने सिवा और सभी रिश्ते नाते और उनकी ज़रूरतें नज़र आते हैं. कभी उसने न दावा किया, न माँगा, न शिकायत की, और तो और न ही किसीको शिकायत करने का मौक़ा दिया.

सरल सुलभ नारी मन की तरलता अपने व्यवहार से सभी की आवाज़ों में अपने होने का प्रमाण खोजती रहती है. वह हर रिश्ते को निभाती है, अपने बच्चों की माँ बनकर, पति की पत्नी, बहू, भाभी व नंनद का फ़र्ज़ पूरा करते हुए, एक भाई की बहन बककर, कभी ख़ुद जैसी सहेलियों कीलाडली बनकर, हर एक के रंग में खुद को ढाल लेती है. पर कभी किसी ने उसकी अपनी इच्छा जानने की कोशिश भी न की, और यह भी नहीं पूछा, तुम क्या हो? सबको इतना कुछ देकर, उनसे क्या पाना चाहती हो? पर जब वह तरलता भरे वजूद से भाप बनी तब उसके अस्तित्व के खो जाने पर सभी को शिकायत का मौक़ा मिला.

नारी के मन को जानना, उसको पहचानना, उसके मन को टटोलना उतना ही ज़रूरी है जैसे एक इंसान को ख़ान- पान- चाय- पानी व विश्राम की अन्य सुविधाओं की ज़रूरत होती है. यहबहुत ज़रूरी है भावनाओं के आदान- प्रदान के लिए, रिश्तों की परिपक्वता के लिए, नारी का मान सम्मान एक परिवार की नींव को एक सदी तक आगे ले जाने का मूल मंत्र है.

2-आदमी के भीतर का सन्नाटा

भीड़ में खड़ा वह आदमी

सिर्फ आदमी नहीं था

वह एक खाली कमरा था

जिसमें

कोई दस्तक नहीं होती थी

शोर में सन्नाटे, सन्नाटों में शोर एक अविरल संवाद सा होकर उस तन्हा इंसान को कुछ यूँ घेर लेता है कि उसके दिल के दर पर अगर दस्तक भी होती है तो उसके कान तक आहट नहीं पहुँचती.

उसके बाहरी व भीतरी खलाओं में शून्य भर गया होता है. उसे शोर और खामोशी में कोई अंतर नहीं महसूस होता है. ख़ालीपन उसका आवरण बन गया है, जो उसे हर आवाज़, हर आहट, हर स्पंदन से दूर रखता है किसी ख़ाली घर के ख़ाली कमरे की तरह

३-नदी के पास बैठा आदमी

नदी बहती रही

अपनी शांत जिद के साथ

उस आदमी ने

अपने हाथ पानी में डुबोए

और बहुत देर तक

लहरों को टूटते देखा

उसे लगा

मन भी नदी की तरह होता है

ऊपर से शांत

भीतर अनगिनत धाराओं से भरा हुआ

अपने ख़यालों की धुन में बैठा वह गुमसुम इंसान नदी की ज्वार भाटे की तरह उमड़ती और सिमटाव करती लहरों को टूटकर बिखरते देखता है, पानी में विलीन होते देखता है तब उसे नदी ख़ुद जैसी लगती है, ऊपर से शांत, एक ठहराव की स्तिथि में, पर अपने भीतर एक हलचल, एक कोलाहल लिए हुए जिसमें चाहत का शोर है, इच्छाओं की चाहत है. अधूरी आशाओं की सम्पूर्णता की चाहत है. ऐसी अनगिनत धाराओं से भरा हुआ एक दिल है जो सपने देखने से नहीं कतराता, पर लहरों की तरह उन्हें टूटते हुएनहीं देख सकता.

देवी नागरानी


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