Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

सुराही का सच

 

देवांश सक्सेना

सुराही का सच


धुएँ का महल है, छलावे का साया,

ज़हर को जिन्होंने हक़ीक़त बनाया।

जो बिखरा स्वयं में, वो ढूँढे सहारा,

कि कतरे ने समंदर को छलना सिखाया!


अरे ओ मुसाफ़िर! ज़रा होश धर ले,

तुझे मौत अपनी ही बाहों में भरेगी।

तू जिसको समझता है जीने का जरिया,

वही घूँट तेरी सुराही करेगी!


यही सोच तेरी कि तू मुक्त होगा?

ज़रा देख आईना, तू लुप्त होगा!

काँच के जाम में जो उबलता जुनून है,

वो तेरी ही साँसों का बहता ख़ून है।


तू पीता नहीं है, तुझे पिया जा रहा है!

ग़ुलामी का यह ज़हर जिया जा रहा है!

जो बिखरे तो समझो कि तुम ही मिटोगे,

हवाओं के रुख़ से कहाँ तक छुपोगे?


तुझे लगता है कि तू बादशाह है,

मगर ये तो तबाही का इक रास्ता है।

तू जिसको समझता है जीने का जरिया,

वही घूँट तेरी सुराही करेगी!


दीये ने हवा से मोहब्बत रचाई,

नतीजा हुआ ये कि लौ मुस्कुराई।

मगर बुझते-बुझते ये अहसास आया,

कि उसने तो अपनी ही हस्ती गँवाई!


तू चिराग़ है, कोई बुझता हुआ दीपक नहीं,

तू आग है, कोई पिघलता हुआ मोम नहीं!

तेरा हर एक ख़्वाब जो धुएँ में उड़ा है,

वो तेरी ही ख़ामोश चीख़ों से जुड़ा है।


आज़ादी का दावा तू किससे करेगा?

जब अपनी ही रूह का तू कातिल बनेगा!

सम्हालो अपने इस खोए हुए कल को,

पहचानो इस बहते हुए आज के पल को।


तू जिसको समझता है जीने का जरिया,

वही घूँट तेरी सुराही करेगी!


उठो ओ जवाँ! अपनी पहचान माँगो,

इस झूठी सुरा से निज सम्मान माँगो!

कहाँ खो गई वो तरकश की रवानी?

क्या धुएँ में बहेगी ये तेरी जवानी?


तू पंख लगाके जो उड़ना चाहता है,

तो इस ज़हरीले गगन को गिरा दे!

अगर खुद पे तुझको ज़रा सा यकीं है,

तो इस काँच की दुनिया को हिला दे!


तेरा अपना साहिल, तेरा अपना मुक़द्दर,

तू ही है तूफ़ान, तू ही है समंदर!

छोड़ ये नशे की खोखली सी रातें,

कर अपनी हक़ीक़त से दो-चार बातें।


तू जिसको समझता है जीने का जरिया,

वही घूँट तेरी सुराही करेगी


अब फ़ैसला तेरा, तू क्या चुन रहा है?

तू जी रहा है या खुद को बुन रहा है?

ज़हर के प्याले को ठोकर लगा दे,

अपनी ही रूह की मशालें जला दे!


तोड़ दे ये सारे छलावे के घेरे,

तेरी रोशनी में ही छुपेंगे अंधेरे!

तू ज़ंजीर तोड़ेगा, ये जग देखेगा,

तू खुद का सिकंदर है, ये कल बोलेगा!


बोलो! क्या अब भी झुकोगे उस ज़हर के आगे?

या अपनी ही हिम्मत के दीपक जलाओगे?


जागो! और दुनिया से चीख़ के कह दो 


तू जिसको समझता है जीने का जरिया,

वही घूँट तेरी सुराही करेगी

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ