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सियाह रातों का जादू

 

ग़ज़ल  - सियाह रातों का जादू

- देवांश सक्सेना




किसी की आँख में ठहरा हुआ ख़ुमार जादू है,

किसी की बात में छुपता हुआ ख़ुमार जादू है।


ये कैसी रात है, सन्नाटा बोल उठता है,

हवा के साथ कोई अनकहा पुकार जादू है।


किसी ने राख में लिखकर किसी का नाम लिया,

फिर उस मकान में छाया हुआ अँधकार जादू है।


न कोई दीप जला, न कोई चाँद ही निकला,

मगर अँधेरे में चलता हुआ विचार जादू है।


कहीं धुएँ में कोई शक्ल काँपती है अभी,

कहीं दीवार से आती हुई फुसफुसाहट जादू है।


किसी की नींद में दस्तक, किसी के ख़्वाब में डर,

किसी के दिल में उतरता हुआ ख़ुमार जादू है।


न ताबीज़ों की ज़रूरत, न मंत्र की आवाज़,

किसी की नीयत में पलता हुआ विकार जादू है।


जो मुस्कुराकर मिले और दिल में ज़हर रखे,

उस आदमी का भी कैसा ये किरदार जादू है।


किसी के हाथ की लकीरें बदल गईं जैसे,

किसी के भाग्य पे किसका ये अधिकार जादू है।


ये काला जादू है या आदमी की काली नज़र,

जो सामने नहीं दिखता, वही वार जादू है।


बहुत तलाश किया उस रात उसके होने को,

मगर जो सामने था, वही संसार जादू है।


अँधेरी रात ने आख़िर यही सबक़ दिया

हर एक साया नहीं होता गुनहगार जादू है।

 


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