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सवाल बाकी है

 

ग़ज़ल


सवाल बाकी है

By Devansh Saxena

शहर बदला, मगर यहाँ हाल बाकी है,

हर तरफ़ भीड़ है, फिर भी सवाल बाकी है।


जिनके हाथों ने उजाले बाँट दिए घर-घर,

उनके हिस्से में अभी भी मलाल बाकी है।


हमने सच बोल दिया तो लोग खफ़ा होने लगे,

झूठ की महफ़िलों में कमाल बाकी है।


वक़्त ने लाख हमारी आवाज़ को दबाया,

दिल में उठता हुआ इक बवाल बाकी है।


मंज़िलों ने हमें आवाज़ तो दी है लेकिन,

पाँव में चलने का अब भी ख़याल बाकी है।


किससे पूछें कि ये दुनिया किसकी दुनिया है,

आदमी ज़िंदा है, पर आदमी बेहाल बाकी है।


हमने देखा है कई दौर को आते-जाते,

इसलिए आँख में थोड़ा-सा उजाल बाकी है।


कलम चुप है तो समझना कि कहानी खत्म नहीं,

स्याही सूखी है मगर शब्दों का जाल बाकी है।


जो समझते हैं कि आवाज़ को ख़रीदेंगे वो,

उनसे कहना - अभी सीने में धमाल बाकी है।


हम गिरेंगे तो ज़माना हमें फिर उठाएगा,

हमारे बाद भी चलने का सवाल बाकी है।

 


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