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Dr. Srimati Tara Singh
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रात से कह दो

 

रात से कह दो

Devansh  Saxena

रात से कह दो कि अब यूँ मुझे डराया न करे,

मेरी आँखों में कोई ख़्वाब सजाया न करे।


मैंने सीखा है अँधेरों में भी चलना अब तो,

मेरे रास्तों में ये दीपक बुझाया न करे।


हाँ, थका हूँ मैं मगर हारा नहीं हूँ अब तक,

मेरी हिम्मत को कोई आज़माया न करे।


चाँद बादल में छुपा है तो छुपा रहने दो,

मुझको सूरज की तरह कोई बताया न करे।


मैंने रातों में कई दर्द सँजोए हैं मगर,

मेरी ख़ामोशी को कमज़ोर समझा न करे।


मेरी मंज़िल ने मुझे दूर से आवाज़ दी है,

मेरे क़दमों को कोई रोक के बैठा न करे।


जो भी हासिल है, वो इन रातों की मेहनत से है,

कोई किस्मत का मुझे नाम सुनाया न करे।


मैंने गिर-गिर के उठना ही तो सीखा है यहाँ,

मेरे गिरने का तमाशा कोई देखा न करे।


आज अँधेरा है तो क्या, कल उजाला होगा,

वक़्त हर ज़ख़्म को यूँ उम्रभर रखता न करे।


मेरे हिस्से में अगर रात लिखी है तो लिखे,

मैं सुबह होने का विश्वास भी खोया न करूँ।


रात से कह दो- मैं अभी जाग रहा हूँ,

मेरे सपनों को कोई ख़्वाब कहकर टाला न करे।


मैं वो मुसाफ़िर हूँ जो अँधेरों में भी चलता है,

सुबह मेरी होगी - रात से कह दो, मुझे रोका न करे। 

 


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