रात से कह दो
Devansh Saxena
रात से कह दो कि अब यूँ मुझे डराया न करे,
मेरी आँखों में कोई ख़्वाब सजाया न करे।
मैंने सीखा है अँधेरों में भी चलना अब तो,
मेरे रास्तों में ये दीपक बुझाया न करे।
हाँ, थका हूँ मैं मगर हारा नहीं हूँ अब तक,
मेरी हिम्मत को कोई आज़माया न करे।
चाँद बादल में छुपा है तो छुपा रहने दो,
मुझको सूरज की तरह कोई बताया न करे।
मैंने रातों में कई दर्द सँजोए हैं मगर,
मेरी ख़ामोशी को कमज़ोर समझा न करे।
मेरी मंज़िल ने मुझे दूर से आवाज़ दी है,
मेरे क़दमों को कोई रोक के बैठा न करे।
जो भी हासिल है, वो इन रातों की मेहनत से है,
कोई किस्मत का मुझे नाम सुनाया न करे।
मैंने गिर-गिर के उठना ही तो सीखा है यहाँ,
मेरे गिरने का तमाशा कोई देखा न करे।
आज अँधेरा है तो क्या, कल उजाला होगा,
वक़्त हर ज़ख़्म को यूँ उम्रभर रखता न करे।
मेरे हिस्से में अगर रात लिखी है तो लिखे,
मैं सुबह होने का विश्वास भी खोया न करूँ।
रात से कह दो- मैं अभी जाग रहा हूँ,
मेरे सपनों को कोई ख़्वाब कहकर टाला न करे।
मैं वो मुसाफ़िर हूँ जो अँधेरों में भी चलता है,
सुबह मेरी होगी - रात से कह दो, मुझे रोका न करे।
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