ग़ज़ल - ज़िंदगी
By Devansh Saxena
ज़िंदगी रोज़ कोई नया सवाल करती है,
कभी हँसाती है, कभी बेहाल करती है।
हम जिसे उम्रभर अपना समझ के चलते हैं,
वही एक रोज़ हमें बेमिसाल करती है।
कुछ ख़्वाब आँखों में चुपचाप पलते रहते हैं,
वक़्त की धूप उन्हें फिर निढाल करती है।
किसी के जाने से रुकती नहीं ये दुनिया,
मगर भीतर कहीं एक जगह ख़ाली करती है।
हम अपने होने का मतलब तलाशते हैं यहाँ,
ज़िंदगी ख़ुद ही हमें एक मिसाल करती है।
कभी तन्हाई में बैठो तो समझ आता है,
ख़ामोशी भी कई बातें कमाल करती है।
न जाने कल की सुबह क्या लिखा हो किस्मत में,
इसी उम्मीद पे ज़िंदगी हर शाम करती है।
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