यह देह भी थकती है
By Devansh Saxena
यह देह भी थकती है
सिर्फ़ पाँव नहीं।
कभी कंधों पर
दिन भर का संसार रखकर देखो,
कभी सीने में
अनकही बातों का बोझ रखकर देखो,
तब समझोगे
थकान हमेशा
पसीने से दिखाई नहीं देती।
कुछ थकान
आँखों के नीचे उतरती है,
कुछ हथेलियों की लकीरों में,
और कुछ
चेहरे पर मुस्कान बनकर
उम्र भर छिपी रहती है।
यह देह
जिसे हम आईने में
सिर्फ़ आकार समझते हैं,
दरअसल
हमारी पूरी ज़िंदगी का
सबसे ख़ामोश दस्तावेज़ है।
इस पर दर्ज हैं
जागी हुई रातें,
भूखे दिन,
भागते हुए साल,
छूटे हुए लोग,
और वे आँसू
जिन्हें आँखों तक आने की
इजाज़त नहीं मिली।
कभी माथे की शिकन पढ़ना,
कभी हाथों की नसें देखना
वहाँ उम्र नहीं,
पूरी एक कहानी धड़कती है।
हम कहते रहे
“मैं ठीक हूँ।”
और देह
हर बार
हमसे झूठ बोलती रही।
दिल टूटा,
उसने धड़कना नहीं छोड़ा।
मन हारा,
उसने चलना नहीं छोड़ा।
आँखें रोईं,
उसने दुनिया को
देखना नहीं छोड़ा।
कितनी अजीब है यह देह
हम उसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा
ख़र्च करते हैं
और बदले में
उससे पूरी ज़िंदगी माँगते हैं।
सुबह से रात तक
उसे काम में लगाते हैं,
फिर रात को
उससे कहते हैं
“कल फिर तैयार रहना।”
कभी पूछा है उससे
“तू कैसी है?”
नहीं पूछा।
क्योंकि हम
अपने शरीर को
अपना समझते ही कहाँ हैं।
जब तक वह साथ देता है,
हम उसे भूल जाते हैं।
और जिस दिन
वह जवाब देने लगता है,
हमें याद आता है
कि साँस लेना भी
कितनी बड़ी नेमत थी।
एक दिन
यह देह भी चुप हो जाएगी।
न आँखें शिकायत करेंगी,
न कंधे बोझ उठाएँगे,
न पाँव किसी मंज़िल की ओर जाएँगे।
उस दिन
आईना सामने होगा,
मगर उसमें
वह आदमी नहीं होगा
जो हर सुबह
अपने चेहरे पर
एक नई ज़िंदगी पहनकर
निकल जाता था।
इसलिए आज
जब यह देह
थकी हुई हो
उसे थोड़ा आराम देना।
जब आँखें भारी हों
उन्हें सोने देना।
जब मन रोना चाहे
उसे रो लेने देना।
क्योंकि
देह कोई मशीन नहीं,
जिसे उम्र भर चलाया जाए।
यह वही घर है
जिसमें तुम्हारी सारी खुशियाँ,
सारे दुख,
सारे प्रेम,
सारी हारें
और तुम्हारी पूरी ज़िंदगी
एक साथ रहती है।
इसे बचाकर रखना
क्योंकि दुनिया में
बहुत से घर मिल जाएँगे,
मगर अपने भीतर लौटने के लिए
दूसरी देह नहीं मिलेगी।
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