ग़ज़ल - वक़्त का मिज़ाज
- देवांश सक्सेना
जो आज तख़्त पर है, कल उतर भी सकता है,
वक़्त की आँख में मंज़र बदल भी सकता है।
न कर गुरूर कि दुनिया तेरे क़दमों में है,
ये ताज रेत का है, हाथ से फिसल भी सकता है।
हर एक शख़्स की ख़ामोशियों को कम न समझ,
समंदर देर से जागे तो उछल भी सकता है।
चराग़ होने का मतलब है जलते रहना भी,
हवा के सामने शोला मचल भी सकता है।
किसी की सादगी को उसकी शिकस्त मत समझ,
जो आज चुप है, वो कल सवाल कर भी सकता है।
ये नाम, ओहदे, तमग़े यहीं रहेंगे सब,
फ़क़त किरदार ही इतिहास में ढल भी सकता है।
ज़रा सँभल के चल, ऐ आदमी, ज़माने में,
तेरा ही साया तुझसे निकल भी सकता है।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY