वक़्त की गर्दिश में हर शय को फ़ना होना है,
आज जो अपना है, कल उसको जुदा होना है।
किसको मालूम था लम्हों की हक़ीक़त क्या है,
एक पल जीना है, सदियों का ख़ला होना है।
हमने चाहा था कि ठहरा रहे मंज़र कोई,
वक़्त की फ़ितरत में लेकिन तो रवाँ होना है।
कल की उम्मीद में खो बैठे हैं आज अपना,
ज़िंदगी का भी अजब तौर-ए-अदा होना है।
तख़्त मिल जाए तो इंसाँ को ख़बर होती नहीं,
वक़्त बदले तो फ़क़त नाम-ओ-निशाँ होना है।
जिसको कहते थे कभी उम्र का हासिल हमने,
वही इक ख़्वाब की मानिंद धुआँ होना है।
कितने रिश्ते थे जिन्हें वक़्त ने आवाज़ न दी,
और ख़ामोशी को ही आख़िर में सदा होना है।
वक़्त सिखलाता है मिट्टी की हक़ीक़त सबको,
कौन ऊँचा है यहाँ - किसको पता होना है।
इसलिए आज को जी ले कि यही सच है फ़क़त,
कल तो बस वक़्त की तारीख़ में दर्ज़ होना है।
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