ग़ज़ल - तमाशा पुराना है
- देवांश सक्सेना
वही पुराना तमाशा, वही फ़साना पुराना है,
बदलते दौर में भी दर्द का ख़ज़ाना पुराना है।
नए नारों की चादर ओढ़कर बैठे हैं हाकिम,
मगर भूखे लबों पर आज भी तराना पुराना है।
कभी मज़हब, कभी जाति, कभी सरहद का झगड़ा,
हमें आपस में बाँटने का बहाना पुराना है।
वो डमरू बजाते हैं, ये तालियाँ बजाते हैं,
मदारी भी वही है और दीवाना पुराना है।
किताबों में तरक़्क़ी के हज़ारों बाब लिखे हैं,
मगर मज़दूर के हिस्से में पसीना पुराना है।
बदलते वक़्त ने पोशाक बदली है सियासत की,
मगर कुर्सी के पीछे का ठिकाना पुराना है।
मैं आईना दिखाऊँ तो बुरा लगता है उनको,
उन्हें सच से बचाने का बहाना पुराना है।
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