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सोच का सिलसिला

 

सोच का सिलसिला


हर एक बात को दिल पर लगाने लगी है सोच,

गुज़रे हुए लम्हों में जाने लगी है सोच।


जो बात कह न पाया, वही बार-बार याद,

ख़ामोशियों के अर्थ बताने लगी है सोच।


कल क्या हुआ, किसने क्या सोचा, क्यों कहा,

हर प्रश्न का हिसाब लगाने लगी है सोच।


आने वाले कल की फ़िक्र इतनी बढ़ गई,

आज का भी चैन चुराने लगी है सोच।


एक रास्ता मिला तो कई मोड़ दे दिए,

मंज़िल से पहले राह भुलाने लगी है सोच।


सोने को बंद आँखें कीं, रात हो गई मगर,

तकिए के पास बैठकर जगाने लगी है सोच।


मैंने कहा -बस अब तो मुझे जीने भी दे,

हँसकर मेरी बात उड़ाने लगी है सोच।


हर बात का जवाब कहाँ ज़िंदगी में है,

ये बात भी समझने में देर लगाने लगी है सोच।

~  देवांश सक्सेना

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