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रक्षाबंधन — एक धागे से परे

 

रक्षाबंधन — एक धागे से परे

Dy Devansh Saxena

राखी तो बस धागा है,

रिश्ता उससे कहीं गहरा है,

कलाई पर बँधता है धागा,

पर बंधता पूरा बचपन ठहरा है।


वो बचपन की नोक-झोंक,

वो छोटी-छोटी तकरार,

कभी तू मुझसे नाराज़,

कभी मैं तुझसे दो-चार।


फिर माँ की एक आवाज़ पर

सब गिले-शिकवे भूल जाना,

एक ही थाली में बैठकर

फिर से साथ खाना।


समय ने हमको बड़ा किया,

रास्ते अपने-अपने दिए,

मगर रक्षाबंधन आते ही

वो सारे बचपन के दिन जी लिए।


बहन के हाथ की राखी में

सिर्फ धागा नहीं होता,

उसमें दुआ होती है,

प्यार होता है,

और वो विश्वास होता है

जो किसी शब्द का मोहताज नहीं होता।


भाई भी कुछ कहता नहीं,

बस मुस्कुराकर हाथ बढ़ाता है,

और उस एक पल में

जाने कितनी यादों को

फिर से गले लगाता है।


रक्षाबंधन कहता है-

रिश्ते रोज़ निभाने पड़ते हैं,

पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं

जो दूर होकर भी

दिल के सबसे पास रहते हैं।


कल हम और बड़े होंगे,

शायद शहर भी बदल जाएँगे,

मिलना कम होगा,

बातें भी कम हो जाएँगी- 


लेकिन राखी का वो एक धागा

हर साल याद दिलाएगा - 


दुनिया चाहे जितनी बदल जाए,

भाई-बहन का रिश्ता

कभी पुराना नहीं होता।


यही रक्षाबंधन है- 

कलाई पर एक धागा,

दिल में पूरा संसार,

और उम्र भर साथ चलने वाला

एक अनकहा-सा प्यार।

 

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