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पानी रहा

 

ग़ज़ल  - पानी रहा

- देवांश सक्सेना


वो माँ की आँख में ठहरी हुई निशानी पानी रहा,

बहुत कुछ खो गया लेकिन पुरानी पानी रहा।


कभी दरिया था, उसके दिल में थी ऐसी रवानी,

किनारों पर मगर अब सिर्फ़ वीरानी पानी रहा।


सफ़र में धूप थी, सहरा था, होंठों पर तिश्नगी,

तेरे हाथों से मिला इक घूँट, ज़िंदगानी पानी रहा।


किसी की आँख से निकला तो अश्क कहलाया,

किसी की याद में ठहरा तो कहानी पानी रहा।


शहर ऊँचा हुआ, शीशे के मकाँ बनते गए,

मगर हर छत के नीचे एक प्यासा पानी रहा।


जो खेत माँगते थे बादल की मेहरबानी कभी,

वहीं मिट्टी ने कहा अब कहाँ पानी रहा।


समंदर सामने था, फिर भी प्यास बढ़ती ही गई,

ये कैसा दौर है, जिसमें आदमी पानी रहा?


वो बारिशों के दिनों की वो कच्ची-सी ख़ुशबू,

मेरी मिट्टी में आज तक वो जवानी पानी रहा।


कुएँ सूखते गए और नल चमकते रहे,

अजीब बात है घर में तो नूरानी पानी रहा।


हमने दरिया को बाँटा, फिर शहरों में बेच दिया,

हर एक बूँद में लेकिन कोई कहानी पानी रहा।


कभी रिश्ते भी पानी की तरह होते थे निर्मल,

ज़रा-सी धूप पड़ी, बस बे-मानी पानी रहा।


जिसे छूकर कभी धरती ने ज़िंदगी पाई,

उसी को हमने समझा बस रवानी पानी रहा।


बहुत संभाल के रखा हमने अपना हर सामान,

मगर जो सबसे ज़रूरी था, वही फ़ानी पानी रहा।


अब आईना भी पूछता है रात-दिन मुझसे

तेरे अंदर तो सब कुछ है… मगर पानी रहा 


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