नज़र में नूर उतर आए, तो नवरात्रि समझना
Devansh saxena
नज़र में नूर उतर आए, तो नवरात्रि समझना,
अँधेरों में दिया जल जाए, तो नवरात्रि समझना।
फ़क़त माथे पे टीका और हाथों में नहीं पूजा,
कोई टूटे हुए को थाम ले, तो नवरात्रि समझना।
वो दुर्गा सिर्फ़ मंदिर की किसी तस्वीर में कब हैं,
कोई निर्बल भी सिर उठाकर चले, तो नवरात्रि समझना।
बहुत आसान है जयकारों में आकाश तक पहुँचना,
कोई अपने ही भीतर से लड़े, तो नवरात्रि समझना।
जो अपने क्रोध को जीतें, वही साधक हैं दुनिया में,
कोई तलवार रखकर मुस्कुराए, तो नवरात्रि समझना।
नहीं काफ़ी है चुनरी, फूल, रोली और दीपक भी,
किसी की आँख का आँसू ढले, तो नवरात्रि समझना।
माँ की चौखट पे जाकर माँगना इतना ही ऐ दिल,
तेरे भीतर का रावण भी मरे, तो नवरात्रि समझना।
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