ग़ज़ल - मोहब्बत और हवस
- देवांश सक्सेना
जिस्म की चाहत को मोहब्बत मत कहो,
हर तड़पती रात को उल्फ़त मत कहो।
जिस्म छू लेना बहुत आसान है मगर,
दिल को छूने की कोई कोशिश तो करो।
वक़्त कट जाए तो रिश्ते ख़त्म हैं,
ऐसी रिश्तों की कहानी मत कहो।
मोहब्बत में उसकी ख़ुशी भी चाहिए,
सिर्फ़ अपनी प्यास को चाहत मत कहो।
वो अगर ख़ामोश हो, तो रुक भी जाओ,
हर ख़ामोशी को इजाज़त मत कहो।
हुस्न ढलता है, बदन मिट्टी में है,
रूह से जुड़ना ही चाहत ये समझो।
जिस्म मिल जाए तो सब कुछ मिल गया?
इश्क़ को इतना भी सस्ता मत कहो।
हवस माँगती है बस अपना हिस्सा,
इश्क़ कहता है तुम्हें खोना मत कहो।
इश्क़ में क़ब्ज़ा नहीं, आज़ादी है,
प्यार को अपनी मिल्कियत मत कहो।
वो तुम्हारा हो, ये ज़रूरी तो नहीं,
उसकी मरज़ी के बिना रिश्ता मत कहो।
इश्क़ वो है जो बिछड़कर भी रहे,
सिर्फ़ मिलने को ही उल्फ़त मत कहो।
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