मौत और ज़िंदगी
ज़िंदगी भर आदमी किस बात पर इतराता है, मौत का एक लम्हा सब हिसाब समझाता है।
महलों में रहने वाला भी मिट्टी में मिल जाता है, वक़्त का पहिया हर इक चेहरा बदल जाता है।
कोई दौलत के लिए इंसानियत बेचता रहा, कोई ख़ाली हाथ रहकर भी दुआएँ पाता है।
ज़िंदगी की दौड़ में इतना भी आगे मत निकल, क्या पता जिसको तू पीछे छोड़ता है, वही काम आता है।
मौत तो बस एक दिन दस्तक देने आएगी, ज़िंदगी का सवाल है तू किस तरह जी पाता है।
नाम पत्थर पर लिखाकर कौन अमर हुआ यहाँ, याद वो रहता है जो दिल में जगह बनाता है।
साँस की कीमत समझ, ये वक़्त लौटेगा नहीं, जो भी पल हाथ में है, बस वही तेरा ख़ज़ाना है।
साँस थम जाए तो कहानी ख़त्म नहीं होती, मौत के बाद भी हर शख़्स की याद एक-सी नहीं होती।
जिसने बाँटा हो अँधेरों में भी रोशनी का सफ़र, उसके जाने से कभी इंसानियत कम नहीं होती।
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा बस इतना-सा है मौत सबकी आती है, मगर याद सबकी नहीं होती।
- देवांश सक्सेना
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