कविता - मनुष्यत्व की लौ
By Devansh saxena
शहर में रात उतरती है
तो सबसे पहले
दुकानों के शटर गिरते हैं,
फिर खिड़कियों में
रोशनी जलती है।
हर घर के भीतर
एक अलग संसार है
कहीं थाली में बचा हुआ भोजन,
कहीं दवा की पर्ची के नीचे
दबा हुआ वेतन,
कहीं किसी बूढ़े की आँखें
दरवाज़े पर टिकी हुई।
शहर फिर भी
बहुत व्यवस्थित दिखाई देता है।
सड़क के किनारे
एक आदमी सो रहा है
उसके पास न कोई पता है,
न कोई ताला,
न कोई ऐसी चीज़
जिसे चोर चुरा सके।
सुबह लोग निकलेंगे,
उसे देखकर
अपनी गति थोड़ी बदल लेंगे;
किसी को देर हो रही होगी,
किसी को दफ़्तर,
किसी को अपनी ही ज़िंदगी।
और वह वहीं रहेगा
शहर की भागती हुई
सभ्यता के बीच
एक अनुत्तरित प्रश्न की तरह।
हमने बहुत कुछ बना लिया है
ऊँची इमारतें,
चौड़ी सड़कें,
शीशे के दफ़्तर,
और ऐसे घर
जिनमें हवा भी
अनुमति लेकर प्रवेश करती है।
बस एक चीज़
लगातार छोटी होती गई
दूसरे मनुष्य के दुःख के लिए
हमारे भीतर बची हुई जगह।
अब दुख भी
आँकड़ों में आता है,
भूख समाचार बनती है,
मृत्यु एक संख्या,
और आँसू
कुछ क्षणों की ख़बर।
फिर भी
हर जगह सब कुछ समाप्त नहीं हुआ।
किसी अस्पताल के बाहर
एक अनजान आदमी
दूसरे अनजान आदमी के लिए
रक्त देने खड़ा है।
किसी पुल के नीचे
एक स्त्री
अपने हिस्से की रोटी
एक बच्चे की हथेली में रख देती है।
किसी वृद्धाश्रम की खिड़की पर
हर रविवार
एक चेहरा आता है
जिसका उस बूढ़े से
कोई रिश्ता नहीं।
शायद मनुष्यत्व
बड़े कामों में नहीं,
इन्हीं छोटे-छोटे क्षणों में
अपनी आख़िरी साँस बचाए हुए है।
और शायद
सभ्यता का अर्थ भी यही है
कि हम इतने आगे बढ़ जाएँ
कि पीछे छूटे हुए आदमी को
भूलें नहीं।
क्योंकि जिस दिन
किसी दूसरे का दुःख
हमारे भीतर कोई हलचल पैदा नहीं करेगा,
उस दिन हमारे पास
शहर तो होंगे,
मकान होंगे,
बहुत-सी रोशनियाँ होंगी
लेकिन रोशनी में
मनुष्य दिखाई नहीं देगा।
इसलिए
अपने भीतर एक छोटी-सी जगह
अँधेरे के लिए भी बचाए रखना
वहीं से कभी
किसी दूसरे के दुःख की आवाज़ आएगी।
और उसी आवाज़ के साथ
शायद फिर
धीरे-धीरे जलेगी
मनुष्यत्व की लौ।
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