मैं ही मुजरिम, मैं ही मुंसिफ़
- देवांश सक्सेना
मैंने ख़ुद अपने ही किरदार पे इल्ज़ाम लिखा, मैं ही मुजरिम, मैं ही मुंसिफ़ ये कैसा इंसाफ़ लिखा।
उम्र भर औरों के ऐबों का हिसाब करता रहा, अपने हिस्से में मगर मैंने ही इख़्तिलाफ़ लिखा।
आईने के सामने जब भी मेरा सच आ गया, मैंने हर सच को नई दलील देकर ख़िलाफ़ लिखा।
मेरी ख़ामोशियों में दफ़्न थे कितने ही सवाल, मैंने हर इक सवाल का जवाब ख़िलाफ़ लिखा।
जिन ख़ताओं पे ज़माने को सज़ा देता रहा, उन्हीं ख़ताओं ने मेरा नाम बार-बार लिखा।
किससे माँगूँ अब रिहाई, किससे चाहूँ मैं अमाँ, मैंने ख़ुद ही अपने हाथों अपना इन्साफ़ लिखा।
जब मेरे ज़मीर ने पूछा, बता, बेदाग़ है तू? मेरी नज़रों ने झुककर बस यही अल्फ़ाज़ लिखा
मैं ही मुजरिम, मैं ही मुंसिफ़, मैं ही अपना गवाह, मैंने ख़ुद अपने ही हक़ में, ख़ुद ही ख़िलाफ़ लिखा।
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