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किरदार को जलाओगे कैसे

 

ग़ज़ल — किरदार को जलाओगे कैसे

— देवांश सक्सेना


जलाते रहो पुतले, बुराई मिटाओगे कैसे,

जो बैठा है तुम्हारे भीतर, उसे जलाओगे कैसे।


हर इक चेहरे के पीछे एक दुनिया और भी है,

फ़क़त चेहरे से इंसाँ को समझ पाओगे कैसे।


वो ज्ञानी था, मगर अहंकार ने उसको मिटा डाला,

उसकी भूल से सबक़ लेकर ख़ुद को बचाओगे कैसे।


दशहरे पर तो हर बस्ती में रावण जल ही जाता है,

जो ज़िंदा है तुम्हारे मन में, उसे हराओगे कैसे।


किताबों में उसे पढ़कर उसे मुजरिम बना देना,

उसके ज्ञान की गहराई तलक तुम जाओगे कैसे।


फ़क़त इक पुतले के जलने से कहाँ दुनिया बदलती है,

जो भीतर बैठा है रावण, उसे पहचानोगे कैसे।

 


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