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काल के कटघरे में

 

काल के कटघरे में

By Devansh Saxena

कहा जाता है

मृत्यु के बाद

एक दरवाज़ा खुलता है,

जिस पर कोई नाम नहीं लिखा होता।


उसके पार

न दिन है, न रात,

न अपना, न पराया

केवल कर्म हैं

और उनका हिसाब।


वहीं बैठा है यमराज,

काल का अधिपति,

हाथ में दण्ड,

आँखों में ऐसी कठोरता

जिसके सामने

राजाओं के मुकुट भी

मिट्टी लगते हैं।


चित्रगुप्त

किसी मनुष्य की जाति नहीं पूछते,

उसका पद नहीं पूछते,

उसकी जेब नहीं टटोलते।


बस खोल देते हैं

जीवन की वह पुस्तक

जिसे आदमी

धरती पर रहते हुए

भूल गया था।


एक पन्ने पर लिखा है

उसने किसी भूखे को देखा था,

मगर आँखें फेर ली थीं।


दूसरे पर

उसके शब्दों ने

किसी निर्दोष का मन तोड़ा था।


तीसरे पर

उसे सत्य मालूम था,

फिर भी

उसने झूठ का साथ दिया।


यमराज पूछते हैं—


“बताओ,

तुम्हारे पास जीवन था,

फिर तुमने

मनुष्य होने का अवसर

क्यों गँवाया?”


और तब

वह आत्मा

पहली बार समझती है

धरती पर किए गए कर्म

मृत्यु के साथ नहीं मरते।


कुछ आत्माएँ

रौरव की ओर जाती हैं,

जहाँ अपने ही कर्मों की प्रतिध्वनि

उनका पीछा करती है।


कुछ को

तप्त यातनाओं का सामना करना पड़ता है,

कुछ को ऐसी पीड़ा

जिससे बचने का कोई मार्ग नहीं।


कहीं उबलते पात्रों की

भयावह कल्पना है,

कहीं अग्नि का प्रदेश,

कहीं अंधकार इतना गहरा

कि मनुष्य

अपने ही भय से

सामना करने लगे।


और कहीं

कर्म के अनुसार

ऐसी कठोर यातना

जिसे देखकर

काल भी मौन हो जाए।


कढ़ाई में तलने की

कथाएँ भी कही गई हैं,

पर शायद

उससे बड़ी यातना यह है

कि मनुष्य

अपने ही कर्मों का सत्य

अपनी आँखों के सामने देखे।


वहाँ

कोई वकील नहीं।


कोई सिफ़ारिश नहीं।


कोई फोन नहीं

जो कह दे

इसे छोड़ दीजिए,

यह मेरा आदमी है।


वहाँ

धन का दरवाज़ा बंद है,

अहंकार का दरवाज़ा बंद है,

बहानों की सारी खिड़कियाँ बंद हैं।


वहाँ केवल एक भाषा चलती है


कर्म।


जिसने हिंसा बोई,

उसे भय मिला।


जिसने छल बोया,

उसे अपने ही छल का भार मिला।


जिसने किसी की आँखों में

आँसू रखे,

उसे समझ आया

कि आँसू की भी

एक कीमत होती है।


लेकिन यमराज

केवल दण्ड नहीं हैं।


वे न्याय हैं।


वे उस अंतिम सत्य के प्रहरी हैं

जहाँ मनुष्य

अपने बनाए हुए चेहरे से

मुक्त हो जाता है।


वहाँ कोई महान नहीं,

कोई तुच्छ नहीं।


वहाँ राजा भी

अपने कर्मों के सामने

एक साधारण मनुष्य है।


और शायद

यमलोक का सबसे बड़ा भय

नरक की आग नहीं


अपना ही सच है।


क्योंकि धरती पर

हम दूसरों से छिप सकते हैं,

अपने चेहरे पर

मुस्कान रख सकते हैं,

पाप को तर्क दे सकते हैं,

गलती को परिस्थिति कह सकते हैं।


पर उस दरबार में

चित्रगुप्त की पुस्तक खुलती है

तो आदमी

अपने ही जीवन का

गवाह बन जाता है।


यमराज दण्ड उठाते हैं

और उससे पहले

एक आख़िरी अवसर देते हैं


“जो करना था,

वह कर चुके।


अब देखो

तुमने अपने जीवन के साथ

क्या किया।


तभी आत्मा समझती है


यमलोक मृत्यु का डर नहीं,

कर्मों का आईना है।


और नरक कहीं

बहुत दूर नहीं


वह उस क्षण जन्म लेता है

जब मनुष्य

अपने भीतर के मनुष्य को

मार देता है।

 


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