गजल - ज़ुल्फ़ों के नाम
देवांश सक्सेना
तेरी ज़ुल्फ़ों में ठहरी हुई शाम लिखूँ,
या इन्हें रात का कोई पैग़ाम लिखूँ।
जब भी बिखरीं तो हवाओं ने कहा कुछ मुझसे,
मैं इन्हें देख के फिर अपना ही नाम लिखूँ।
इनकी ख़ुशबू में कहीं बीते हुए पल हैं महफ़ूज़,
कैसे हर याद को काग़ज़ पे सरेआम लिखूँ।
तेरी ज़ुल्फ़ों का ये अंदाज़ भी क्या अंदाज़ है,
मैं इसे इश्क़ कहूँ, या कोई इल्ज़ाम लिखूँ।
एक लट चेहरे पे आ जाए तो दुनिया रुकती है,
उसको हटते हुए देखूँ तो क्या काम लिखूँ।
रात गहरी हो तो लगता है यही बात सही
तेरी ज़ुल्फ़ों को ही अब अपना मुक़ाम लिखूँ।
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