ग़ज़ल — इस्तीफ़ा
- देवांश सक्सेना
मैंने झुकने से बेहतर उठ जाना लिखा,
अपने ज़मीर को अपना ठिकाना लिखा।
जिस जगह सच की क़ीमत अदा हो रही थी,
मैंने उस बाज़ार से ख़ुद को बेगाना लिखा।
मेरी ख़ामोशियों को कमज़ोरी न समझो,
मैंने हर सब्र के पीछे फ़साना लिखा।
मेरे दस्तख़त ही मेरी गवाही बने,
जब भी काग़ज़ पे अपना इस्तीफ़ा लिखा।
वो समझते रहे, मैं थक के चला आया हूँ,
मैंने जाते हुए भी नज़राना लिखा।
जिस कुर्सी पे बैठकर ज़मीर बिकता हो,
उससे बेहतर है फ़क़ीरी का याराना लिखा।
मैंने रुतबे की चमक को कभी सच न माना,
अपनी ग़ैरत को ही अपना ख़ज़ाना लिखा।
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