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इंसानों को पहचानना

 

इंसानों को पहचानना

देवांश सक्सेना


चेहरों की भीड़ में चेहरा पढ़ना पड़ता है,

हर शख़्स को थोड़ा वक़्त देना पड़ता है।


कुछ लोग हँसते हुए भी दर्द छुपाए रखते हैं,

कुछ आँखों को ख़ामोशी से पढ़ना पड़ता है।


हर हाथ मिलाने वाला अपना नहीं होता,

रिश्तों को वक़्त की कसौटी पर कसना पड़ता है।


मीठी बातों से किरदार नहीं पहचाना जाता,

कभी ख़ामोशी में भी इंसान परखना पड़ता है।


जो साथ चले, ज़रूरी नहीं हमसफ़र हो,

कभी राहों से भी रिश्तों को समझना पड़ता है।


वक़्त बदलता है तो चेहरे खुलने लगते हैं,

कुछ सच को आने तक वक़्त देना पड़ता है।


अब इतना सीखा है दुनिया के मेले में आकर,

हर किसी को दिल के क़रीब नहीं रखना पड़ता है।


इंसानों को पहचानना कोई फ़न नहीं शायद,

बस ख़ुद को थोड़ा समझदार करना पड़ता है।

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