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होश की ज्वाला

 

देवांश सक्सेना

होश की ज्वाला


भ्रम के इस मेले में साथी,

सबने मुखौटे पहने हैं,

काँच के झूठे टुकड़ों को

हीरे समझे गहने हैं।

भीड़ चली जिस ओर निरंतर,

तू भी उसमें बहने निकला,

एक बार अपने भीतर झाँक

क्या सच में तू रहने निकला?


सुध-बुध खोकर भटक रहा क्यों

दुनिया के इस बाज़ार में?

सच भी कितना छिप जाता है

झूठे रंग-रूप के भार में।

छोड़ अज्ञान का नशा ज़रा,

अपनी चेतना को जगा,

अपने भीतर दीप जला और

अँधियारे से आँख मिला।


भोर की पहली किरण कहे

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


दिखावे की इस दुनिया में

मन अपना क्यों उलझा बैठा?

दूसरों की चमक देखकर

अपना ही चेहरा भूला बैठा।

लाइक-कमेंट की छोटी दुनिया

कितने सपने खा जाती है,

स्क्रीन के पीछे दौड़ती आँखें

सच्चाई से दूर हो जाती हैं।


मदिरा केवल पात्रों में ही

भरी हुई हो, ऐसा क्या?

झूठे सुख और झूठी चाहत

मन को बहकाएँ, कम है क्या?

अपनी हस्ती का विज्ञापन

हर पल क्यों करता है मन?

जो तू सच में है, वही बनकर

जी ले अपना यह जीवन।


चेतना की एक किरण कहे

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


भीड़ चले जिस ओर, ज़रूरी

नहीं वही मंज़िल हो,

जिस पथ पर सब चलते जाएँ,

वही सही हो क्यों ऐसा हो?

अपना दीप स्वयं जलाकर

अपनी राह बनाना सीख,

दूसरों की अंधी धुन पर

अपना जीवन मत दे भीख।


अँधेरा चाहे कितना गहरा,

दीप उसे डराता है,

एक छोटी-सी लौ भी अक्सर

रात बदलकर जाती है।

राख समझकर फेंक न देना

अपने भीतर की चिंगारी,

इसी राख के नीचे सोई

हो सकती है आग तुम्हारी।


अंतर का आलोक पुकारे

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


सुख-दुःख के इस सागर में

मन को इतना चंचल मत कर,

क्षणभर की इस माया के पीछे

अपना जीवन घायल मत कर।

आज जो अपना लगता है,

कल वह छाया हो सकता है,

जिसके पीछे भाग रहा तू,

वह सपना भी खो सकता है।


तू पथिक है इस जीवन का,

राह तुझे ही चुननी है,

सोई हुई चेतना की लौ

तुझे स्वयं ही सुननी है।

जब भीतर का सूरज जागे,

कुहासा खुद मिट जाएगा,

जिसने खुद को जान लिया है,

वह फिर कहाँ भटक पाएगा?


आत्म-विवेक की आवाज़ कहे

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


सब कुछ एक दिन मिट जाएगा,

रह जाएगा केवल सत्य,

नाम, दिखावा, झूठी दौलत

सबका होना है अंततः क्षय।

क्षणिक नशे की प्यास छोड़कर

आत्मबोध की प्यास जगा,

मन के सूने मंदिर में

ज्ञान का एक दीप जला।


तम कितना भी गहरा हो,

एक दीप बहुत होता है,

खुद को पहचानने वाला ही

सच में भीतर से जागता है।

उठ, जाग और आगे बढ़ तू,

अब और नहीं विश्राम कर,

अपने भीतर की इस लौ से

हर अँधियारा पार कर।


तेरा अपना मन ही कहता

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


जब दुनिया तुझको बहकाए,

तू अपने भीतर लौट आना,

जब झूठ चमककर सच बन जाए,

तू विवेक का दीप जलाना।

मदिरा चाहे बाहर छलके,

तू होश का प्याला भरना,

जीवन की इस लंबी राह में

अपने सत्य के साथ चलना।


क्योंकि जीत यही नहीं कि

दुनिया तेरा नाम पुकारे,

जीत तो तब है जब तू खुद

अपने मन को पहचान सके सारे।

अपने भीतर सत्य बचा ले,

अपनी चेतना को संभाल,

जीवन चाहे जैसा भी हो

बुझने मत देना भीतर की होश की ज्वाला।


 


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