हमारा हुनर, हमारी राह
देवांश सक्सेना
हम अपने हुनर का सबूत वक़्त पर देंगे,
अभी तो ख़ामोश हैं, जब बोलेंगे असर देंगे।
मंज़िलों की ज़िद नहीं, रास्तों का हुनर रखते हैं,
हम जहाँ चल पड़ें, रास्ते वहीं से निकलते हैं।
सहारों के भरोसे हमने उड़ान कब भरी है,
हमारे हौसलों से ही हमारी राह बनी है।
हमें कम आँकने वालों का भी एहतराम करते हैं,
हम जवाब कम देते हैं, मगर काम तमाम करते हैं।
हुनर को काग़ज़ों और लफ़्ज़ों का मोहताज न समझ,
ख़ामोश दरिया भी समंदर का पता रखते हैं।
न काग़ज़ की ज़रूरत है, न उधार के अल्फ़ाज़ की,
हम अपने ख़यालों में भी अपनी ज़ुबाँ रखते हैं।
हमें परखने से पहले ज़रा ठहरकर देखिए,
हम अपनी ख़ामोशी में भी इक दास्ताँ रखते हैं।
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