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गणपति बप्पा

 

गणपति बप्पा -  एक रूहानी ग़ज़ल

By devansh saxena

जब-जब थककर मेरी आँखों में समंदर आया,

मैंने बस “गणपति” कहा 

दिल को सहारा आया।


जिस तरफ़ देखा, वहाँ दर्द ही दर्द था बप्पा,

आपको याद किया, रूह में उजाला आया।


मेरे हालात ने जब मुझसे मेरा सब छीन लिया,

आपका नाम लिया फिर मुझे जीने का ख़याल आया।


कितनी रातें मेरी ख़ामोश दुआओं में कटीं,

कितनी बार आपका नाम मेरे होंठों पर आया।


मैंने माँगा भी नहीं कुछ, मगर इतना पाया

आपका करम हुआ, तो हर कमी में सुख पाया।


मेरे मुक़द्दर की लकीरों से अगर लड़ना हो,

आपका हाथ हो सिर पर, तो कहाँ डर पाया।


विघ्न आए तो मुझे राह से भटका न देना,

मेरे बप्पा, मुझे गिरकर भी सँभलना सिखाना।


मैं बहुत दूर निकल जाऊँ अगर अपने आप से,

अपनी सूँड की छाँव में फिर मुझे बुलाना।


मेरी औक़ात ही क्या आपके चरणों के आगे,

आप चाहें तो ख़ाक को भी मुक़द्दर बना देना।


न दौलत की तमन्ना, न किसी ताज की चाहत,

बस मेरे दिल में सदा आपका मंदिर रहे बप्पा।


मेरी हर साँस में आपका ही नाम उतरता रहे,

मेरी हर धड़कन में आपका ही उजाला रहे बप्पा।


और जब आख़िरी साँस हो, आँखें बंद हों मेरी,

मेरे होंठों पे “गणपति बप्पा” का ही नारा रहे।

 


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