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Dr. Srimati Tara Singh
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एक कदम मृत्यु की ओर

 

एक कदम मृत्यु की ओर


हर सुबह जन्म लेती है,
हर शाम कुछ कह जाती है,
ज़िंदगी की किताब में
एक पन्ना और घट जाती है।
हम दौड़ रहे हैं मंज़िल की ओर,
पर मंज़िल से पहले
समय खड़ा है
हाथ में मौन लिए,
और हर धड़कन से कहता है
“तू मेरा मेहमान है।”
एक कदम मृत्यु की ओर,
हर कदम जीवन का भी है,
क्योंकि अंत की आहट ही
जीने का अर्थ सिखाती है।
जो कल था, आज नहीं,
जो आज है, कल नहीं होगा,
फिर क्यों न इस पल को
इतना खूबसूरत कर दें
कि जाने के बाद भी
हमारा ज़िक्र कहीं होगा।
मृत्यु कोई डरावना प्रश्न नहीं,
वह जीवन का अंतिम उत्तर है;
और शायद इसी वजह से
हर साँस इतनी अनमोल है।
तो चलो-
मृत्यु की ओर बढ़ते कदमों को
जीवन की ओर मोड़ दें,
जो मिला है कुछ पल के लिए
उसे प्रेम, शब्द और कर्मों से जोड़ दें।
क्योंकि अंत में
कदम तो सबके रुकेंगे-
पर सवाल यह रहेगा,
हम चले कितनी दूर नहीं,
हमने रास्ते में
कितनी ज़िंदगी जी।

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