ग़ज़ल - दो मिनट की ख़ुशी
Devansh Saxena
भूख लगी तो चूल्हे पर पानी चढ़ा लिया,
दो मिनट में हमने अपना जहाँ बना लिया।
ना कोई दावत थी, ना कोई मेहमान था,
एक कटोरी मैगी ने दिल बहला दिया
मसाले की खुशबू आई जब रसोई से,
कमरे में बैठे बचपन को फिर बुला लिया।
कभी हॉस्टल की रात, कभी बारिश का मौसम,
एक गरम कटोरी ने सब ग़म भुला दिया।
पैसे कम थे, मगर ख़्वाहिशें बड़ी थीं,
दो पैकेटों में हमने पूरा स्वाद पा लिया।
दो मिनट की थी वो छोटी-सी कहानी,
मगर उस स्वाद ने कितना कुछ याद दिला दिया।
कभी दोस्तों के साथ, कभी तन्हा कमरे में,
मैगी ने हर बार कोई अपना बना लिया।
ज़िंदगी भी शायद मैगी जैसी ही है,
गरम रहे तो हर पल को ख़ूबसूरत बना लिया।
और सच पूछो तो बात मैगी की नहीं,
भूख ने बस एक बहाना सा बना लिया।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY