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दर्द का बयान नहीं होता

 

ग़ज़ल -  दर्द का बयान नहीं होता

देवांश सक्सेना


हर ज़ख़्म का ज़बान से बयान नहीं होता,

हर अश्क आँख से ही अयाँ नहीं होता।


कुछ घर में रह के उम्र गुज़ार देते हैं लोग,

हर रहने वाले शख़्स का मकान नहीं होता।


जो शख़्स दूसरों के लिए उम्र भर जिया,

उसके लिए भी कोई जहान नहीं होता।


कुछ फ़ैसले ख़मोशियाँ करती हैं उम्र भर,

हर बात का लबों से एलान नहीं होता।


हमने भी अपने दर्द को तहज़ीब दे तो दी,

हर मुस्कुराता चेहरा शादमान नहीं होता।


दुनिया ने पूछ ही लिया आख़िर हमारा हाल,

हर पूछने वाला मेहरबान नहीं होता।


कुछ लोग छोड़ जाते हैं मिट्टी में अपने निशाँ,

हर नाम वक़्त के लिए अमर निशान नहीं होता।

 


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