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चेहरों के इस शहर में

 

ग़ज़ल -  चेहरों के इस शहर में

By devansh saxena

चेहरों के इस शहर में चेहरे बहुत मिले,

पर दिल की तलाश में हम तन्हा बहुत मिले।


मतलब की धूप निकली तो रिश्ते पिघल गए,

साये भी अपने घर के पराये बहुत मिले।


जिसको समझ के अपना, भरोसा किया था हमने,

वही लोग पीठ पीछे हँसते हुए मिले।


दौलत मिली तो आदमी ऊँचा तो हो गया,

पर उसके कद से छोटे ही इंसानियत मिले।


बाज़ार में ज़मीर भी सामान हो गया,

ईमान बेचने वाले यहाँ रोज़ बहुत मिले।


मासूम की चीख़ दब गई शोर-ए-महफ़िलों में,

तालियाँ बहुत मिलीं, मगर हमदर्द कम मिले।


सच बोलने की कीमत यहाँ इतनी ज़्यादा थी,

सच के साथ चलने वाले ही तन्हा बहुत मिले।


रिश्तों में प्यार कम था, हिसाबों की भीड़ थी,

हर मोड़ पर हमें नए सौदे बहुत मिले।


किससे कहें कि दर्द भी होता है आदमी को,

पत्थर के जिस्म वाले यहाँ ख़ास बहुत मिले।


हम ढूँढ़ते रहे थे कोई आदमी दिल वाला,

इस शहर में मगर सिर्फ़ चेहरे बहुत मिले।


अब तो दुआ यही है, ऐ ख़ुदा इस जहाँ में,

इंसान कम सही, मगर इंसानियत बची रहे।

 


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