बाज़ार में इंसान
देवांश सक्सेना
यह कैसा दौर है, क्यों आदमी बाज़ार में है,
कि इंसाँ आज भी इंसाँ नहीं, व्यापार में है।
किसी की भूख को अवसर समझ बैठे हैं कुछ लोग,
किसी का ख़्वाब बिकने को किसी अख़बार में है।
जिसे कहते थे दुनिया वाले कल तक “बेटी अपनी”,
वही बेटी न जाने किसके अधिकार में है।
कहीं बचपन मज़दूरी की हथेली थाम बैठा है,
कहीं कोई जवानी आज भी दीवार में है।
न जाने कितने घर अब तक किसी की राह तकते हैं,
किसी माँ की दुआ अब भी उसी इंतज़ार में है।
उसे रोज़ी का वादा था, उसे मंज़िल का सपना था,
मगर वह क़ैद निकला
जिस सफ़र को प्यार में है।
ये केवल जिस्म का सौदा नहीं है, ऐ ज़माने,
किसी इंसान की पूरी ज़िंदगी व्यापार में है।
ज़रा आँखें उठाकर देख अपने शहर की गलियों को,
कहीं कोई ख़ामोश चीख़ तेरे दरबार में है।
जो बेबस है, उसे कमज़ोर समझ लेना नहीं साहब,
कभी उसकी ख़ामोशी भी बहुत ललकार में है।
न इंसान बिकेगा अब, न सपनों की कोई क़ीमत
ये आवाज़ हर उस दिल की है जो इंसानियत के प्यार में है।
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