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बही में दर्ज हिसाब

 

ग़ज़ल - बही में दर्ज हिसाब

-  देवांश सक्सेना


किसी ख़ामोश बही में एक खुलती-सी किताब है,

हर एक साँस के पीछे किसी कर्म का हिसाब है।


न कोई शोर दरबारों में, न कोई गवाह आया,

मगर स्याही में हर ख़ता का अब भी इक नक़ाब है।


जिसे दुनिया ने भुला डाला, जिसे वक़्त ने छुपाया,

किसी की आँख का आँसू भी उसमें बे-जवाब है।


कहीं टूटा हुआ दिल है, कहीं इक हाथ थामे हैं,

कहीं ख़ामोश-सी नेकी, कहीं झूठा जवाब है।


चित्रगुप्त सिर्फ़ लिखते हैं या हम ख़ुद ही लिखते हैं?

हमारे कर्म की उँगली में आख़िर कौन-सी किताब है?


यमराज आते हैं क्या सच में कोई मौत लेकर,

या जिस सच से भागते थे, वही उनका नक़ाब है?


न राजा बच सकेगा और न ताजों का कोई दावा,

वहाँ बस एक सवाल होगा—तेरा क्या हिसाब है?


न दौलत साथ जाएगी, न शोहरत की कोई परछाईं,

वहाँ इंसान के हाथों में बस उसका इंतख़ाब है।


जिसे दुनिया में हम कहते रहे “किस्मत का फ़ैसला”,

कभी देखा तो समझ आया वो अपना ही जवाब है।


ये रूह आईने में रोज़ ख़ुद से पूछती है,

जिसे तू ढूँढ़ता फिरता है, वो तेरे अंदर का ख़्वाब है।


फ़ना के उस किनारे पर कोई इल्ज़ाम चलता नहीं,

न कोई झूठ वहाँ चलता, न कोई लफ़्ज़ लाजवाब है।


वहाँ आख़िरी-सी साँसों में ये पर्दा खुलता है,

कि जीवन भर जिसे समझा सफ़र, वो असल में हिसाब है।


न बाहर कोई बही है, न कहीं बैठा हुआ क़ातिब,

तेरे हर कर्म की धड़कन में लिखी अपनी किताब है।


 मौत को मत समझ कि बस साँसों का रुक जाना,

कभी-कभी मरने से पहले ही खुल जाता हिसाब है।


और आख़िर में ये राज़ समझ आया ख़ामोशी में

चित्रगुप्त कोई और नहीं… इंसान ही अपनी किताब है।

 


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