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अपनी ही धुन का मुसाफिर

 

अपनी ही धुन का मुसाफ़िर

By : Devansh Saxena

भीड़ में रहकर भी अपनी पहचान रखता हूँ,

मैं ख़ामोश रहूँ, फिर भी अरमान रखता हूँ।


किताबों में मिले मुझको जहाँ के अफ़साने,

मैं हर लफ़्ज़ में अपना एक जहान रखता हूँ।


कभी संस्कृत की खुशबू, कभी उर्दू का रंग,

मैं दिल में कई भाषाओं का सम्मान रखता हूँ।


कलम मेरी साथी है, काग़ज़ मेरा हमराज़,

मैं लफ़्ज़ों में धड़कता हुआ इंसान रखता हूँ।


मंच मिले तो आवाज़ में विश्वास उतरता है,

मैं अपनी बात में थोड़ा तूफ़ान रखता हूँ।


शिव का नाम हो होंठों पर, तो डर कैसा फिर,

मैं माथे पे नहीं - दिल में भगवान रखता हूँ।


मुझे चमकती हुई दुनिया का शोर नहीं भाता,

मैं सादगी में भी अपना अरमान रखता हूँ।


कभी गिरता हूँ, कभी ख़ुद को सँभाल लेता हूँ,

मैं हार के भीतर भी एक उड़ान रखता हूँ।


लोग पूछते हैं, “आख़िर क्या ख़ास है तुममें?”

मैं हँसकर कहता हूँ - अपना अंदाज़ रखता हूँ।


नाम से क्या होगा, काम से पहचान बने,

मैं आज नहीं तो कल - अपना मुकाम रखता हूँ।


मैं किसी और की तस्वीर बनने नहीं आया,

मैं अपने ही किरदार का एक नाम रखता हूँ। 

 


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