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अँधेरे रास्ते का मुसाफ़िर

 

ग़ज़ल - अँधेरे रास्ते का मुसाफ़िर

-देवांश सक्सेना


वो रात थी कि कोई रहगुज़र नहीं था,

मेरे सिवा वहाँ कोई हमसफ़र नहीं था।


अँधेरा इस क़दर था रास्ते की धूल पर,

कि दूर तक कहीं कोई भी घर नहीं था।


हवा भी आज जैसे साँस रोक बैठी थी,

दरख़्तों पर परिंदों का भी शोर नहीं था।


किसी के पाँव की आहट हुई तो रुक गया मैं,

पलट के देखा वहाँ कोई बशर नहीं था।


एक बुझता दीप राह में मिला था देर से,

उसके सिवा अँधेरे में कोई असर नहीं था।


मैं पूछता रहा ख़ामोश रात से मंज़िल,

मगर जवाब देने को कोई शहर नहीं था।


कभी लगा कि कोई साथ-साथ चलता है,

मगर वो मेरा ही साया था, कोई और नहीं था।


सहर हुई तो समझ आया उस सफ़र का राज़,

जिसे मैं ढूँढ़ रहा था, वो कहीं बाहर नहीं था।


मैं लौट आया मगर आज भी ये सच है

अँधेरे रास्ते का अंत कोई घर नहीं था।


वो रास्ता मुझे मुझ तक ही ले गया आख़िर,

मैं जिसको ढूँढ़ता था, वो मुझसे दूर नहीं था।

 


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