ग़ज़ल - अब कोई इंतज़ार नहीं
Devansh Saxena
तेरे जवाब की चाहत में रात ढलती रही,
मेरी उम्मीद मगर फिर भी जलती रही।
मैंने हर बार समझा - शायद व्यस्त होंगे आप,
यही तसल्ली मुझे देर तक छलती रही।
मेरे अल्फ़ाज़ पहुँचते रहे तेरे दर तक,
तेरी ख़ामोशी मगर मुझसे सवाल करती रही।
मैंने चाहा कि शिकायत कभी लहजे में न हो,
दिल की बेचैनी मगर आँखों से निकलती रही।
किसी के सामने ख़ुद को यूँ बार-बार रखना,
मेरी अपनी ही नज़र में मुझे गिराती रही।
एक दिन ख़ुद से कहा - बस, बहुत हो चुका,
और फिर ख़ामोशी मेरे साथ चलती रही।
न कोई ख़त, न कोई सवाल, न कोई इंतज़ार,
अब मेरी राह मेरे साथ ही चलती रही।
जिसे देना था जवाब, उसने ख़ामोशी दी,
और मुझे मेरी ख़ुद्दारी वापस मिलती रही।
अब न शिकवा है किसी से, न कोई इल्तिज़ा,
जो कहानी थी अधूरी, वहीं ख़त्म होती रही।
अब किसी के जवाब की ज़रूरत नहीं मुझे,
मेरी ख़ामोशी ही मेरा जवाब बनती रही।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY