ग़ज़ल - आवाज़ों का वजूद
देवांश सक्सेना
हर इक आवाज़ को पहचान मिलनी चाहिए,
वतन की ख़ाक को ज़ुबान मिलनी चाहिए।
न कोई ख़्वाब किसी एक रंग में ढल जाए,
हर एक रंग को अपनी उड़ान मिलनी चाहिए।
ये मुल्क सिर्फ़ नक़्शे की लकीर तो नहीं,
हर इक सूबे को अपनी ज़ुबान मिलनी चाहिए।
सवाल पूछने वालों को गुनहगार न कहो,
सवाल करने की भी आज़ादी मिलनी चाहिए।
जो फ़ैसले हों, वो जनता के हक़ में ही हों,
सियासतों को भी ये बात माननी चाहिए।
न ताज एक का हो, न फ़ैसला एक का,
हर इक सदन को अपनी पहचान मिलनी चाहिए।
जो भीड़ में दबे बैठे हैं ख़ामोशियों के तले,
उन्हें भी बोलने की अब ज़ुबान मिलनी चाहिए।
वतन की एकता का ये तक़ाज़ा है दोस्तों,
अलग-अलग विचारों को जगह मिलनी चाहिए।
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