आदमी कहाँ है
By Devansh Saxena
हमारे समय में
आदमी बहुत हैं,
पर मनुष्य
कम दिखाई देता है।
लोग मिलते हैं,
हाथ मिलाते हैं,
हाल पूछते हैं
और फिर अपनी-अपनी
जरूरतों की ओर लौट जाते हैं।
अब किसी का हाल
उसकी आँखों से नहीं,
उसकी हैसियत से जाना जाता है।
किसी के घर में
चूल्हा कई दिनों से ठंडा हो,
तो भी पड़ोसी को खबर नहीं होती
हाँ, उसके घर में
नई कार आई हो
तो पूरी गली जान जाती है।
हमने दुख को भी
अपनी सुविधा के हिसाब से
देखना सीख लिया है।
सड़क पर गिरा आदमी
हमें देर कराता है,
भूखा बच्चा
हमारी तस्वीर बिगाड़ता है,
और किसी की चीख
हमारे कानों तक पहुँचकर
अक्सर
हमारे मोबाइल की घंटी में
दब जाती है।
हम कहते हैं
समय बदल गया है।
शायद समय नहीं,
हम बदल गए हैं।
हमने अपने बच्चों से कहा
आगे बढ़ो,
सबसे आगे बढ़ो,
किसी से पीछे मत रहना।
लेकिन यह कहना भूल गए
कि आगे बढ़ते हुए
कभी पीछे मुड़कर भी देख लेना,
कहीं कोई
तुम्हारे कारण पीछे तो नहीं छूट गया।
अब रिश्तों में भी
एक हिसाब रहता है।
कितनी बार फोन किया,
किसने पहले संदेश भेजा,
किसने जन्मदिन याद रखा,
किसने क्या दिया
मानो प्रेम नहीं,
कोई पुराना बही-खाता हो।
हमारे घरों में
सामान बढ़ता गया,
कमरे भरते गए,
अलमारियाँ भरती गईं,
बस
एक-दूसरे के लिए
जगह कम होती गई।
कभी-कभी लगता है
हमने सुविधा तो पा ली,
पर सहूलियत के साथ
संवेदना खो दी।
अब आदमी
आदमी से कम,
अपनी पहचान से अधिक मिलता है।
वह पूछता है
तुम कौन हो?
और उत्तर सुनते ही
तय कर लेता है
कि तुम उसके लिए
कितने उपयोगी हो।
मुझे डर
इस बात का नहीं
कि दुनिया इतनी बदल गई है।
डर इस बात का है
कि हमें यह बदलाव
अब असामान्य भी नहीं लगता।
हमने पत्थरों से शहर बनाए,
लोहे से पुल बनाए,
आकाश तक इमारतें उठाईं
पर अपने भीतर
एक छोटा-सा मनुष्य
बचाए नहीं रख सके।
कल इतिहास
हमारी तरक्की लिखेगा,
हमारी उपलब्धियाँ गिनेगा,
हमारी बनाई हुई दुनिया
पर गर्व करेगा।
पर अगर किसी दिन
कोई बच्चा उस इतिहास को पढ़कर
हमसे पूछ बैठे
इतना सब बना लिया,
पर आदमी कहाँ था?
तब शायद
हम अपनी उपलब्धियाँ गिनाएँगे,
अपनी तरक्की का हिसाब देंगे,
बहुत कुछ कहेंगे।
मगर उस बच्चे के सामने
हमारी सारी बातें
धीरे-धीरे चुप हो जाएँगी।
क्योंकि उसके सवाल में
हमारी पूरी सभ्यता खड़ी होगी
और हमारे पास
आदमी होने का
कोई प्रमाण नहीं होगा।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY