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आदमी की क़ीमत

 

आदमी की क़ीमत

- देवांश सक्सेना


इस शहर में हर शख़्स की क़ीमत लगी हुई है,

किसी की ज़ात, किसी की शोहरत तली हुई है।


यहाँ सच बोलने वालों के लहजे तौले जाते हैं,

झूठ की मेज़ पर अक्सर महफ़िल सजी हुई है।


जो बाँटता था कभी धूप दूसरों के आँगन में,

उसी के हिस्से की धूप आजकल जली हुई है।


यहाँ रिश्ते भी ज़रूरत के हिसाब से मिलते हैं,

किसी की जेब भरी है, किसी की ख़ाली हुई है।


वो आदमी जो सबके दर्द सुनता रहा उम्र भर,

उसी की आँख में इक उम्र से नमी हुई है।


बड़े मक़ाम पे पहुँचकर ये समझ आया मुझे,

हर एक जीत के पीछे कोई कमी हुई है।


मैं अपने दौर से पूछूँ तो आख़िर पूछूँ क्या,

यहाँ ख़ामोशी भी कितनी सलीक़े से पली हुई है।


किसी ग़रीब की आँखों में झाँककर देखो,

वहाँ भी एक दुनिया ख़्वाबों से भरी हुई है।

 


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