आईना मेरे ख़िलाफ़ था
— देवांश सक्सेना
मैं ख़ुद को ढूँढ़ने निकला, ज़माना ख़िलाफ़ था,
मेरे ही घर में मेरे होने का गवाह ख़िलाफ़ था।
मैं अपने ज़ख़्म दुनिया से छुपाकर चल तो दिया,
मगर मेरी ख़ामोशी का हर लम्हा ख़िलाफ़ था।
मैंने सच बोलकर सोचा कि हल्का हो जाऊँगा,
मगर सच के ही चेहरे पर नक़ाब ख़िलाफ़ था।
जिसे मैं उम्र भर अपना समझकर पूजता रहा,
उसी के फ़ैसलों में मेरा ख़ुदा ख़िलाफ़ था।
मैं अपनी हार का इल्ज़ाम किसके नाम करता,
मेरे हाथों में ही मेरे ख़िलाफ़ का हिसाब था।
अजब अदालत थी, मुंसिफ़ भी मैं, मुजरिम भी मैं,
मेरे ही फ़ैसले में मेरा जवाब ख़िलाफ़ था।
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