वायदा
अवनीश कुमार भटनागर
दो मित्र, दोनो अति बूढे, दोनो के पैर लटके कब्र में, कब कौन पहले निकल ले किसी को नहीं ही पता।
ये डोर ऊपर वाले के हाथ में, किसे अभी उठाये या किसे न उठाएं बरसों बरस।
दोनों बचपन के मित्र,जब से “क” कमल का पढ़ना सीखा तभी से संग संग।
जवां भी हुए, संग संग।
संग संग बूढ़े भी हुए,अब अति बूढे भी।
जब रिटायर हुए तो सरकार के हिसाब से बूढ़े,जब सुपर सीनियर सिटीजन हुए तो अति बूढ़े।
रोज़ एक दूजे को गरियाते,एक दूजे की गलतियां गिनाते,कमियां निकालते पर एक बीड़ी या एक चाय के गिलास के सहारे घण्टो संग संग बैठे रहते,एक मूढ़े पर,एक लकड़ी की आराम कुर्सी पर।
एक ही हिंदी के अखबार से समाचार जान लेते,फिर हमें क्या करना,या हम क्या कर सकते है, के भाव से निर्विकार होकर निश्चिंत हो जाते।
पड़ोसियो ने नाम रखा था “दो बैलों की जोड़ी”
रोज़ न मिले तो दोनों को चैन कहाँ,
खाना हज़म न हो, घर दोनो ने संग संग बनवाये थे,दोनो घरों के लॉन अंदर से साझे थे बस एक पांच फुट की बाउन्ड्री थोड़े से गेप के साथ, ज़रा देर हुई नही,दूजा लाठी की खट खट के साथ दूसरे के वरांडे में।
बूढ़ी ,मगर बुलंद आवाज़ !
अबे! मर तो नही गया !! कितनी देर हो गई!
बुड्ढा,आलसी हो गया है!
बहू ! इसे देर तक न सोने दिया कर, कभी सोते सोते ही निकल लिया तो—!
दोनों की बहुए दोनों को अपना ससुर मानती ,रोज़ ही दोनो का पैर छूती,असीस लेती।
दोनो बूढ़ो की खुराक चिड़िया की खुराक,किसी बहू को कोई परेशानी ही नही होती।
पर एक मौका ऐसा आन पड़ा कि एक बूढ़े को कुछ महीनों के लिए अपने ही देश के दूसरे शहर जाना पड़ा,अपनी बेटी की देखभाल के लिए,उसके दामाद तीन महीनों के लिए विदेश प्रवास पर थे
बेटी अकेली थी,पिता का मन, तो पिता का मन,शरीर बुढ़ा गया था,मन तो नहीँ।
बेटी के लिए हुलस उठा,जैसे जाते ही अपनी गुड़िया को गोद मे ले लेगा,पर अब ये गुड़िया दो किशोर बच्चों की मां हो चुकी है,60-62 किलो का वजन भी हो चुका था
पर पिता मन में तो ये कल्पना कर ही सकता है।
खैर,जैसे तैसे राजधानी पकड़ी, 48 घण्टो के सफर के बाद बेटी के घर ।
पर रोज़ मित्र से झंझट कैसे करें,मोबाईल का युग अभी शुरू हो ही रहा था,
दोंनो को ये खुराफाती यंत्र समझ नही आया,लेंड लाइन से कब तक बतियाते।
मन तो यादों के गलियारों में बार बार चला जाता।
याद आते वो दिन जब,कई कई दिन तो यूँ ही एक दूसरे के पास ही बैठे बीत जाते, कोई आपस में बात नही करता,
दुआ सलाम भी नहीं। बस इशारे में ही—--”कि ठीक हो-?”
कब चाय पी ली,बीड़ी भी शेयर कर ली,कुछ खा भी लिया,फिर एक दो घण्टे में उठ लिए
डगमग,अपने अपने बिस्तर की ओर।
इस अति बूढ़े वाली उमर में दोस्तो को एक भय हमेशा सताता रहता है कि कल मिल सकेंगे कि नहीँ,
सदा के लिए बिछुड़ने का भय, भयभीत किये रहता है।
इसीलिए यदि थोड़े ही दिनों के लिए बिछुड़ने का कोई कारण हो भी
तो भी दोनों एक दूजे से एक प्रोमिस, एक वायदा जरूर लेना चाहते है कि जब तक लौट न आऊं
“जाना” मत।
दोनो ही जानते है कि ये “वायदा” निभाना दोनो के ही वश में नही है, फिर भी!
बस बिछुड़ते समय बूढ़े मित्र ने ये “वायदा” जरूर ले लिया था कि :
यार!------बस तीन महीनों की ही बात है,जब लौटूंगा तो पहले फोन कर दूंगा,
फिर मेरी एक ही “आवाज़ “पर तू जरूर आ जाना।
“जाना” नही!!!
पर आखिरी शब्द गले में ही रुंध गए,निगाहे फेर ली,मुंह छुपा कर टैक्सी में समा गए।
पहले तो एक एक दिन यूँ ही झूठी उम्मीद में बीता, फिर दिन हफ्ते में बदले,
बूढ़ी निगाहे कलेण्डर की गिनती, गिनती।
दिन काटे नही कट रहे थे,जिस मूढे पर मित्र बरसों से कब्जा जमाए था अब वो मूढ़ा मुंह चिढ़ा रहा था,
उसकी गद्दी पर हाथ फिरा कर बूढ़ा हाथ वापिस लौट आता।
जैसे तैसे एक महीना पूरा हुआ, फिर अन्तोगत्वा तीसरा महीना भी पूरा हुआ,आमद की सूचना भी आ गई,
मित्र की गाड़ी भी आकर घर के सामने रुक गई, फिर वही बुलन्द आवाज़ कि अबे! @@@@@
मर तो नही गया!
पर अन्दर से कोई आवाज़ नही,कोई लाठी की खट खट नहीँ, पर्दा कई बार हिला पर वो हवा थी।
बहू भी पल्लू मुंह मे डाले चुपचाप, घूँघट में,पर्दे के संग खड़ी हो गई।
दिल डूबने को हुआ,लगा कि इससे पहले धड़कता हुआ दिल उछल कर बाहर ही न टपक पड़े
कि पीछे से कांपती गलबहियां आ गिरीं!
मद्धिम कपकपाती आवाज़ कानो में पड़ी
इत्ती जल्दी, नहीँ निकलने वाला,
तुझे मिले बगैर, तो हरगिज़ नहीं।
दोनों लड़खड़ाते हुए जैसे तैसे अपने आसन पर बैठ गए,गले साथ नही दे रहे थे,
चश्मे आंखों का पानी
रोक नही पा रहे थे,
दोनो बहुएं पर्दे के पीछे से मुस्करा रही थी,
”वायदा” जो पूरा हुआ था ।
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