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मेरी आँखें

 

मेरी आँखें

अवनीश (Avnish Bhatnagar)


मित्रो, ये एक काल्पनिक रचना है,एक पुरुष के अंतर्मन की दशा के चित्रण का प्रयास मात्र है।


मेरी आँखें कैसी बदकिस्मत हैं ,न जाने क्या क्या देख सकती हैं, अतीत तो ऐसे देखती है जैसे सब कुछ सामने ही घटित हो रहा है, पर ये आंखे तो हैं मन की आंखे है,कई बार जो घटित हो रहा है और जो हो चुका है, वो दोनों को एक साथ बराबर बराबर देख सकती है,एक को दायीं तरफ की आंख देखती है  तो दूसरे को बायीं तरफ की,दोनो समानांतर व एक साथ।


आज भी कुछ ऐसा ही चल रहा है,मेरी पत्नी मुझसे सदा के लिए बिदा ले रही है ,


सभी बिलख रहे है,क्या बच्चे क्या नातेदार क्या पड़ोसी और वो सभी जो हमारे परिवार से कैसे न कैसे जुड़े हैं,

 मैं पुरुष हूँ आंखों से कुछ न टपक पड़े ,नियंत्रण में करने का प्रयास सफलता से कर रहा हूँ

,गला साथ नही देता,बार बार रुंध जाता है,पर इंतजाम के लिए बोलना तो पड़ता है है,बोल अपने आप निकल रहे हैं ,अपनी प्रेयसी को, अपनी संगिनी को,अपनी जन्म जन्म की साथी को खुद से पहले अपने हाथों रुखसती दे रहा हूँ,


ईश्वर मुझ पर क्यों कर नाराज़ हुआ,मैंने क्या पाप किये,किसका दिल दुखाया, किस बात की सज़ा मुझे मिल रही है-?


पर आंखे अपना काम बखूबी कर रही है,अतीत बिल्कुल स्पष्ट देख रही हैं, घर की देहरीज पर डोली आ रुकी है,कहार पसीना सुखा रहे हैं, मेरी सभी ‘कुछ’ डोली से  थोड़ी झुक कर,कुछ नज़ाकत व बहुत कुछ शर्म की लाल गठरी बनी बाहर आ रही है,

स्त्रियां मंगल ध्वनि कर रही हैं, काफी गोरी,कमनीय देह,लाल जोड़े में सजी धजी,चेहरे पर नए घर में स्वीकार ली जाऊं की घबड़ाहट से भरी,अनजान लोंगो के बीच,


कौन कौन है, को जानने की उत्सुकता, अपने मायके की याद को विस्मृत करने की कोशिश,


मैं ही उसका सभी कुछ, एक ही सम्बल, जो खुद ही इस नई जिम्मेदारी को खुशी खुशी संभालने को डरते डरते तैयार।


कैसे इस कोमलांगी को सहज कर पाऊंगा का भय लिए,दोस्तों की चुहल से परेशान सा, सामने खड़ा मुस्करा रहा था।

वही, वोही, आज भी लाल जोड़े में है डोली की जगह  कुछ और है,

वो सब कुछ भूल कर,छोड़ कर,किसी अन्य लोक में जा रही है,वही देह जो कुछ दिन पूर्व  लाइलाज बीमारी के दंश व असहनीय दर्द को सह नही पा रही थी उससे मुक्त हो चुकी है,


 पर थी तो मेरी ही संगिनी की देह,जिसे मैं कितने तरीकों से सजी संवरी देखता था,

 आज और कुछ ही घण्टो में अन्नंत में विलीन हो जाएगी।

जैसे डोली आकर रुकी थी वैसे ही अंतिम विदा अपना रूप ले रही है,सदा सदा के लिए मेरी ‘सब कुछ’ को मुझसे सदा सदा के लिए अलग करने को ,

हमेशा हमेशा के लिए बिछुड़ने के लिए।


मेरी आँखें दोनो दृश्यों की बखूबी अन्तर्मन को दिखा रही हैं,

मैं अभागा अपनी आंखे बंद भी नही कर सकता।

देखना मेरी नियति ही है।


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