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51 साल के साधारण से जीवन और तीसेक साल के लगभग असफल रचनाकाल में सीखे कुछ सबक
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1- जिसे जो लिखना है लिखेगा, जिसे जो कहना है कहेगा। आपके चाहने, न चाहने से कोई असर नहीं पड़ेगा।
2-आप क्या हैं, यह लोग तय करेंगे वह भी लंबे समय में। आप खुद को कुछ भी कहते रहें, वह पानी पर लक़ीर की तरह मिटता जाएगा। इसलिए इस चिंता में पड़े बिना लिखते जाएँ, करते जाएँ। उसी से तय होगा सब।
3-ईर्ष्या और कुंठा रचना की हत्यारन हैं।
4-अहंकार सहज है, स्वाभाविक है। उसका नियंत्रण आपको रचनात्मक ऊर्जा देता है, और उसके वशीभूत होते जाना आपके कलम से धार छीनता चला जाता है।
5- लेखन में सफलता भ्रम है। हर नई किताब, नई कविता, नई कहानी क्रिकेट की नई पारी की तरह होती है, शून्य पर निबट जाने की संभावना लिए।
हर ईमानदार लेखक को अपनी रचना दूसरे-तीसरे पाठ में कमज़ोर लगती है।
6- पाठक उपभोक्ता (Consumer) नहीं है, सहयात्री है। उसे खुश करने के लिए लिखना खुद को दुखी करते जाना है, उसे साथ लेकर सत्य की तलाश लेखन का मूल है।
7- पढ़ना भी देखने की तरह किसी का विशेषाधिकार नहीं, प्रीविलेज भी नहीं। खाली समय में किए जाने वाला शौक़ भी नहीं। यह मनुष्य की सहज भूख और ज़रूरत है जिसे बाज़ार ने दूसरे नशों से दबा दिया है। पढ़ते आप मोबाईल पर भी हैं, हाँ अच्छी किताबों की जगह व्हाट्सअप, फेसबुक और ट्विटर पर मौजूद अथाह कचरा। देखते आप अब भी हैं अच्छे सिनेमा और प्रकृति की जगह रीलें। बेहतर दुनिया के ख्वाब की जगह अमीरी के सपने।
देखे और पढ़े बिना मनुष्य का काम नहीं चल सकता।
8- जितना उपलब्ध और सहज रहेंगे, स्टार बनने की संभावना उतनी ही कम होगी और अच्छा लिख पाने की संभावना उतनी ही ज़्यादा।
आप स्टार बनना चाहते हैं या अच्छा लिखना चाहते हैं, यह आपका चयन है।
9-अपनी रोटी कमाना आपकी ज़िम्मेदारी है।
10 - दुनिया में कहीं भी, कभी भी मुख्यधारा की राजनीति में बुद्धिजीवी और संवेदनशील लोगों की जगह लगभग नहीं होती। जो ऐसे लोग रहे राजनीति में अक्सर असफल हुए और जो सफल हुए वे अपवाद हैं।
11-किसी को खराब लेखक सिद्ध करके कोई अच्छा लेखक नहीं बन सकता।
12- सच बोलने का, असल में अपने हिस्से का सच बोलने का सुख सबसे बड़ा सुख है। लेखन में, वक्तव्य में या फिर झूठ बोलने की जगह चुप रहने के चुनाव में ही।
13- आदर्श किसी व्यक्ति को नहीं मूल्यों को बनाना बेहतर होता है।
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आप चाहें तो एकदम इग्नोर कर दें, संभव है यह आपके हिस्से का सच न हो।
Chandrakant Zatale ·
ये बाते समझने में व्यक्ती की उम्र गुजर जाती हैं, बहोत सरल तरिके से आप ने ये मौलिक संदेश शब्दो में बांधा हैं...
- 2h
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Asad Afzal Ahmed
Agreed to the last word... very practical thinking...yeh jeevan me taraqqi karne wali soch hai...Gud 1 Bhai 

- 2h
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