Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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जिंदगी ऐसे ही चल रही थी

 

जिंदगी ऐसे ही चल रही थी

पसरा सन्नाटा
हर तरफ
सहमी हुई जुबान
बस मोमबत्ती जल रही थी
जिंदगी ऐसे ही चल रही थी।

लग रहे थे
थपेड़े
हवा के मुझे
जैसे धक्का दे रहा कोई
एक अनहोनी सी हो रही
निराशा जग रही थी
जिंदगी ऐसे ही चल रही थी।

घर में कड़वाहट थी
झगड़े हो रहे
तू.. तू.. मैं.. मैं..
अपनी तेरी हो रही
नजदीकियां घट रही थी
जिंदगी ऐसे ही चल रही थी।

किसी की आंखों में आंसू
किसी के होंठ थर्रा रहे
कोई डरा - डरा
कोई हिम्मत जुटा रहा
मगर कहानियां सबकी अलग थी
जिंदगी ऐसे ही चल रही थी।


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