लखनऊ के एक महान राष्ट्रवादी कवि हैं जिन्होंने मेरी एक पंक्ति पर , “मैं भूखा हूँ तो मेरा धर्म केवल एक रोटी है” पर मुझे खरी खोटी सुनाते हुए सनातन धर्म की स्वानुभूत व्याख्या करके मुझे गलत सिद्ध कर दिया था, मैं कुछ बोला नहीं था।
आज रामधारी सिंह दिनकर की “धर्म” कविता पढ़ी । लेकिन, श्रीमान के लिये दिनकर की कविता भी कोई प्रमाण थोड़ी है????????
“सोचता हूँ जब कभी संसार यह आया कहाँ से?
चकित मेरी बुद्धि कुछ भी कह न पाती है।
और तब कहता, “हृदय अनुमान तो होता यही है,
रोटी के पीछे आटा है क्षीर-सा,
आटे के पीछे चक्की की तान है,
उसके भी पीछे गेहूँ है, वृष्टि है,
वर्षा के पीछे अब भी भगवान है।”
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