ना अपना है सब है पराया
-अंजनी कुमार पाठक
ना अपना है सब है पराया
वक्त हमें है यह सिखलाया
स्वार्थी लोभी इन्सान मिलेंगे
मुख पर कुछ पीछे वार करेंगे
जलन भाव से ग्रसित मानव
मानवता को शर्मसार बनाया
ना अपना है सब है पराया
आओ ऐसा काम करें हम
हर मुश्किल आसान करें हम
यह तन है जो मर्म समझता
जीवन राग इसमें है समाया
ना अपना है सब है पराया
अविरल नदियों की धार बने हम
इक दूजे से प्यार करें हम
काम क्रोध मद लोभ को छोड़ो
मानव को है जो भरमाया
ना अपना है सब है पराया
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