मैं हूँ एक बाबा
©अंजनी कुमार पाठक
मैं हूँ एक बाबा, चलता है मेरा ढाबा,
ढाबा पर हरदम हसीना एक है आती।
मोबाइल से न जाने घंटों यहाँ बतियाती,
मेरी समझ यही है, गड़बड़ है कुछ इरादा।
मैं हूँ एक बाबा, चलता है मेरा ढाबा।
देश के प्यारे बाबा जेल चले गए हैं,
चरित्र भी गया, धन शेष रह गए हैं।
ढोंगी बहुत हैं मिलते,
मैं हूँ सीधा-सादा।
मैं हूँ एक बाबा, चलता है मेरा ढाबा।
निर्मल चरित्र है मेरा, फब्तियाँ सब हैं कसता,
अंदर से डर गया हूँ, मीडिया से डर है लगता।
कानून का झोल ऐसा, फँस जाते निर्दोष ज़्यादा।
मैं हूँ एक बाबा, चलता है मेरा ढाबा।
अपराध बढ़ गया है, रहता हूँ सहम-सहम के,
धंधा है ऐसा मेरा, रहता हूँ संभल-संभल के।
षड्यंत्र चल रहा है,
लगता बहुत ज़्यादा।
मैं हूँ एक बाबा, चलता है मेरा ढाबा।
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