जिन्दगी का ना कोई ठिकाना
अंजनी कुमार पाठक
जिन्दगी का ना कोई ठिकाना
आज यहां कल कहां है जाना?
मानव तन का सार यही है
प्रेम भाव शांति है लाना
टूट रहे सब नाते रिश्ते
काम क्रोध मद लोभ के चलते
खाली हाथ जग में आये हो
खाली हाथ जग से है जाना
जिन्दगी का ना कोई ठिकाना
आओ ऐसा काम करें हम
एक दूजे का सम्मान करें हम
जाति धर्म मानव का दुश्मन
भेदभाव को जड़ से है मिटाना
जिन्दगी का ना कोई ठिकाना
सहनशीलता हो रग रग में
राष्ट्र धर्म हो हर इक नर में
भारत था सोने की चिड़िया
विश्व गुरु है इसे बनाना
जिन्दगी का ना कोई ठिकाना
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