देश को हिंसा में मत झोकों
अंजनी कुमार पाठक
देश को हिंसा में मत झोकों
सत्ता जिसकी खिसक गयी है
कैसे आये दिल से सोचो?
जनगणना दस वर्ष पर होती
सारी योजना इससे है बनती
जो है नागरिक नहीं देश के
इस पर क्यों आपत्ति है होती?
जनसंख्या कैसे हो नियंत्रित ?
देशहित की भी सोचो
देश को हिंसा से मत झोकों
संविधान से देश है चलता
संविधान संशोधन भी है होता
संविधान की शपथ जो लेतें
भेदभाव जात-पात है करता
घुसपैठी आतंकी बढें हैं
कैसे निकले दिल से सोचो ?
देश को हिंसा में मत झोकों
बार बार बंदी है कराते
देश को आर्थिक क्षति पहुंचाते
राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है
आपस में क्यूं तकरार कराते ?
मानवता आज शर्मसार है
नफरत की दीवार को तोड़ो
देश को हिंसा में मत झोकों।
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