तुम मेरे हो
तुम मेरे हो—
जैसे भोर की पहली किरण
ओस से भीगे आँगन को छू ले,
जैसे थकी साँझ को
दीये का उजाला मिल जाए।
तुम मेरे हो—
हर उस ख़ामोशी में
जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाती है,
हर उस मुस्कान में
जो आँखों से उतरकर दिल तक पहुँचती है।
तुम मेरे हो—
संघर्ष की धूप में छाया बनकर,
विश्वास की राह में दीप बनकर,
मेरे हर डर को
अपनी मज़बूती से थामे हुए।
तुम मेरे हो—
क्योंकि तुमसे ही
मेरे सपनों को नाम मिलता है,
मेरे अस्तित्व को अर्थ,
और मेरे होने को पहचान।
तुम मेरे हो—
बस इसीलिए नहीं कि तुम पास हो,
बल्कि इसलिए कि
तुम मेरे हर एहसास में
साँस की तरह बसे हो। ????
लेखक - अनिता देवी शिक्षिका
जिला पूर्वी चंपारण बिहार
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